Thursday, March 28, 2013

Good Friday

                            WE Miss U ... We Love U ... And We Respect U 
                                                              Our Jesus,Our Friend...

Monday, March 25, 2013

HAppy Holi

 Happy Holi To All ......
                                                                        My Question?  


                                                                ये रंग है की जेहर ? 



अपनी होली है की चाइना की दीवाली ? 






ये इन्सान हे की कोण ?


बेचारे सतारा वाशी (महाराष्ट्र)
इनके ह़क का पानी किदर है ?
इनके होली का रंग किदर है?


ये प्लास्टिक के कचरे कोण उठायेगा ?

व रे होली व    ...... फिर भी बोलता हु !!

                                                                  होली मुबारक 

* में 27 मार्च को पानी बर्बाद नही करूँगा ...... 
  और में दिल से खुस रहूँगा ,की मेने देश के लिए कुछ किया .... 
  और वो मेरी हैप्पी होली होगी 



Saturday, March 23, 2013

आवो दीवाने बनते है .... भारत के !!

My today is for them...

                             
                                   में इस काबील नहीं, की इन्की तारीफ़ करू ....... वन्दे मातरम।।

Friday, March 15, 2013

Some of the Famous Books

Great books series on Bhagwan Shiv .... Very nice written By Amish every one should try.

Take A brief Look on this three Books

#1


The Immortals of Meluha 

(Shiva Trilogy #1)


1900 BC. In what modern Indians mistakenly call the Indus Valley Civilisation. The inhabitants of that period called it the land of Meluha a near perfect empire created many centuries earlier by Lord Ram, one of the greatest monarchs that ever lived. This once proud empire and its Suryavanshi rulers face severe perils as its primary river, the revered Saraswati, is slowly drying to extinction. They also face devastating terrorist attacks from the east, the land of the Chandravanshis. To make matters worse, the Chandravanshis appear to have allied with the Nagas, an ostracised and sinister race of deformed humans with astonishing martial skills!

The only hope for the Suryavanshis is an ancient legend: When evil reaches epic proportions, when all seems lost, when it appears that your enemies have triumphed, a hero will emerge.

Is the rough-hewn Tibetan immigrant Shiva, really that hero? And does he want to be that hero at all? Drawn suddenly to his destiny, by duty as well as by love, will Shiva lead the Suryavanshi vengeance and destroy evil?



#2

The Secret of the Nagas 

(Shiva Trilogy #2)


Today, He is a God. 
4000 years ago, He was just a man. 
The hunt is on. The sinister Naga warrior has killed his friend Brahaspati and now stalks his wife Sati. Shiva, the Tibetan immigrant who is the prophesied destroyer of evil, will not rest till he finds his demonic adversary. His vengeance and the path to evil will lead him to the door of the Nagas, the serpent people. Of that he is certain. 
The evidence of the malevolent rise of evil is everywhere. A kingdom is dying as it is held to ransom for a miracle drug. A crown prince is murdered. The Vasudevs Shivas philosopher guides betray his unquestioning faith as they take the aid of the dark side. Even the perfect empire, Meluha is riddled with a terrible secret in Maika, the city of births. Unknown to Shiva, a master puppeteer is playing a grand game. 
In a journey that will take him across the length and breadth of ancient India, Shiva searches for the truth in a land of deadly mysteries only to find that nothing is what it seems. 
Fierce battles will be fought. Surprising alliances will be forged. Unbelievable secrets will be revealed in this second book of the Shiva Trilogy, the sequel to the #1 national bestseller, The Immortals of Meluha.



#3

The Oath of the Vayuputras (Shiva Trilogy #3)


ONLY A GOD CAN STOP IT. 

Shiva is gathering his forces. He reaches the Naga capital, Panchavati, and Evil is finally revealed. The Neelkanth prepares for a holy war against his true enemy, a man whose name instills dread in the fiercest of warriors. 

India convulses under the onslaught of a series of brutal battles. It's a war for the very soul of the nation. Many will die. But Shiva must not fail, no matter what the cost. In his desperation, he reaches out to the ones who have never offered any help to him: the Vayuputras. 

Will he succeed? And what will be the real cost of battling Evil? To India? And to Shiva's soul? 

Discover the answer to these mysteries in this concluding part of the bestselling Shiva Trilogy.


This 3 books are available in all book shops and also online refer also on Google Play.

This is only for that sentence ,"ONLY A GOD CAN STOP IT. "

Thank to give us a wonderful sense  and Best of luck Amish For Future...


Friday, March 8, 2013

English Taunt Songs ye by me

Hashne ka funda Kya....( film: DRAM 2040 )

Kkaise haaslu me thoda sa
hasane wale dunya tu mujko hasa,
khabhi dhuk na ho aisa hashaaaaa.
karu kya me yaki..... kya hu me,
Thanaha ye zaami....Shuki shukiiii.,
Khud ki hasharat hi hai nahi,
zubaa pe hai mere khami,
koi bhi... Khabhi bi ....mujhe.... 
hashe de yanhiiiii,
Sab ko lagtahai.....
bus.....kuch na ho kami.....


Sing loudely in English Taunt

Thursday, March 7, 2013

Happy Women day 8 march 2013 (महिला दिवस की हार्दिक बधाई हो )




Aap Bharat ki nari ho
aap shamman ki adhakari ho
aap Maa Behen Beti ho
aap kitni pyari ho

chalta hai saansar chakra thumese
sari manush jaati aapki abhaari ho



EK sundar tip for u all Nari's: Badjayega saaman thumara jab tan par sahree ho.


Bharti nariyo,
Abb bhi Kai Shivaji,Rana,Bhagat jaise Krantikari
hai tayeer app ki seva me, 
ek Gujaarish hai appse bano aap bhi Abhimani
Wohi Himmatwali jaise Apni Jhashi Wali Rani,,
Jai Jai Bharti nari. 





*Sorry But this priceless words is not for an anti-Indian Womens.

Saturday, March 2, 2013

From Bharat to India .. मुझे भारत जाना हे !!

हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा? 

एक सामान्य जनधारणा है कि महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। लेकिन वही पुराण इससे अलग कुछ दूसरी साक्षी प्रस्तुत करता है। इस ओर हमारा ध्यान नही गया, जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था। तनक विचार करें इस विषय पर:-आज के वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था। लेकिन सात महाद्वीप किसने बनाए क्यों बनाए और कब बनाए गये। इस ओर अनुसंधान नही किया गया। अथवा कहिए कि जान पूछकर अनुसंधान की दिशा मोड़ दी गयी। लेकिन वायु पुराण इस ओर बड़ी रोचक कहानी हमारे सामने पेश करता है।

वायु पुराण की कहानी के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में अर्थात अब से लगभग 22 लाख वर्ष पूर्व स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भरत खंड को बसाया था। प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र नही था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद लिया था। जिसका लड़का नाभि था, नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था। इस ऋषभ का पुत्र भरत था। इसी भरत के नाम पर भारतवर्ष इस देश का नाम पड़ा। उस समय के राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों के अलग-अलग राजा नियुक्त किया था। राजा का अर्थ इस समय धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक से लिया जाता था। राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नीन्ध्र को बनाया था। बाद में भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वह भारतवर्ष कहलाया। भारतवर्ष का अर्थ है भरत का क्षेत्र। भरत के पुत्र का नाम सुमति था। इस विषय में वायु पुराण के निम्न श्लोक पठनीय हैं—सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

इन्हीं श्लोकों के साथ कुछ अन्य श्लोक भी पठनीय हैं जो वहीं प्रसंगवश उल्लिखित हैं। स्थान अभाव के कारण यहां उसका उल्लेख करना उचित नही होगा।हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं तो उसमें पंडित जी संकल्प कराते हैं। उस संकल्प मंत्र को हम बहुत हल्के में लेते हैं, या पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मानकर छोड़ देते हैं। लेकिन उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है। जैसे उसमें उल्लेख आता है-जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….। 

ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं। इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस जम्बू द्वीप में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है, जो कि आर्याव्रत कहलाता है। इस संकल्प के द्वारा हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं।

अब प्रश्न आता है शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश का नाम क्यों जोड़ा जाता है? इस विषय में हमें ध्यान देना चाहिए कि महाभारत नाम का ग्रंथ मूलरूप में जय नाम का ग्रंथ था, जो कि बहुत छोटा था लेकिन बाद में बढ़ाते बढ़ाते उसे इतना विस्तार दिया गया कि राजा विक्रमादित्य को यह कहना पड़ा कि यदि इसी प्रकार यह ग्रंथ बढ़ता गया तो एक दिन एक ऊंट का बोझ हो जाएगा। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस ग्रंथ में कितना घाल मेल किया गया होगा। अत: शकुंतला, दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश के नाम की उत्पत्ति का प्रकरण जोडऩा किसी घालमेल का परिणाम हो सकता है। जब हमारे पास साक्षी लाखों साल पुरानी है और आज का विज्ञान भी यह मान रहा है कि धरती पर मनुष्य का आगमन करोड़ों साल पूर्व हो चुका था, तो हम पांच हजार साल पुरानी किसी कहानी पर क्यों विश्वास करें?

दूसरी बात हमारे संकल्प मंत्र में पंडित जी हमें सृष्टिï सम्वत के विषय में भी बताते हैं कि अब एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरहवां वर्ष चल रहा है। बात तो हम एक एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरह पुरानी करें और अपना इतिहास पश्चिम के लेखकों की कलम से केवल पांच हजार साल पुराना पढ़ें या मानें तो यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और क्या है? जब इतिहास के लिए हमारे पास एक से एक बढ़कर साक्षी हो और प्रमाण भी उपलब्ध हो, साथ ही तर्क भी हों तो फिर उन साक्षियों, प्रमाणों और तर्कों केआधार पर अपना अतीत अपने आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी बनती है।

हमारे देश के बारे में वायु पुराण में ही उल्लिखित है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है। इस विषय में देखिए वायु पुराण क्या कहता है—-हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:।।

हमने शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत के साथ अपने देश के नाम की उत्पत्ति को जोड़कर अपने इतिहास को पश्चिमी इतिहासकारों की दृष्टि से पांच हजार साल के अंतराल में समेटने का प्रयास किया है। यदि किसी पश्चिमी इतिहास कार को हम अपने बोलने में या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो यह हमारे लिये शान की बात समझी जाती है, और यदि हम अपने विषय में अपने ही किसी लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ दें तो रूढि़वादिता का प्रमाण माना जाता है । यह सोच सिरे से ही गलत है। 

अब आप समझें राजस्थान के इतिहास के लिए सबसे प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड का इतिहास माना जाता है। हमने यह नही सोचा कि एक विदेशी व्यक्ति इतने पुराने समय में भारत में आकर साल, डेढ़ साल रहे और यहां का इतिहास तैयार कर दे, यह कैसे संभव है? विशेषत: तब जबकि उसके आने के समय यहां यातायात के अधिक साधन नही थे और वह राजस्थानी भाषा से भी परिचित नही था। तब ऐसी परिस्थिति में उसने केवल इतना काम किया कि जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध में इतिहास संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं उन सबको संहिताबद्घ कर दिया। इसके बाद राजकीय संरक्षण में करनल टाड की पुस्तक को प्रमाणिक माना जाने लगा। जिससे यह धारणा रूढ हो गयीं कि राजस्थान के इतिहास पर कर्नल टाड का एकाधिकार है। ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं। 

अपने देश के इतिहास के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करना हमारा ध्येय होना चाहिए। अपने देश के नाम के विषय में भी हमें गंभी चिंतन करना चाहिए, इतिहास मरे गिरे लोगों का लेखाजोखा नही है, जैसा कि इसके विषय में माना जाता है, बल्कि इतिहास अतीत के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे न्यायशील और धर्मशील राजाओं के कृत्यों का वर्णन करता है। 

‘वृहद देवता’ ग्रंथ में कहा गया है कि ऋषियों द्वारा कही गयी पुराने काल की बात इतिहास है। ऋषियों द्वारा हमारे लिये जो मार्गदर्शन किया गया है उसे तो हम रूढिवाद मानें और दूसरे लोगों ने जो हमारे लिये कुछ कहा है उसे सत्य मानें, यह ठीक नही। इसलिए भारतवर्ष के नाम के विषय में व्याप्त भ्रांति का निवारण किया जाना बहुत आवश्यक है। इस विषय में जब हमारे पास पर्याप्त प्रमाण हैं तो भ्रांति के निवारण में काफी सहायता मिल जाती है। इस सहायता के आधार पर हम अपने अतीत का गौरवमयी गुणगान करें, तो सचमुच कितना आनंद आएगा? 
मुग़ल की देन : हिंदुस्तान


अंग्रेजो की देन : INDIA

हम खुस हे ,

मुझे तो ये विश्वास नहीं होता है ,की  जिन लोगो ने हमारे देश को खुशहली से उठाकर बरबाद कर दिया,
हम उसके दिये नाम पे जी रहे है ।

// मुझे मेरा भारत वापस चाहिये \\

घाव के तीखे नीसां , हमशे छीपाती है माँ
बचे खाकर खुद ,ताज्जा खिलाती है माँ

मूषकिलो से लड़ कर ,हमको जिलाती है माँ
जिमेदारिया लेकर, हमको हस्हती है माँ
अंधकार में फसे जब जब हम , रोषनी कर दिषा दिखाती है माँ
और जब आई पारी हमारी तो , कोन  है माँ।...

वोही माँ भारती जो हम भारतीयों को कई हजारो वर्षो से पाल पोस रही है ।
हमने उनके  लिए क्या किया ...
में अकले ऐक से जो भी हो सकेगा में वो करूंगा ...भारत माँ के लिए

बहुत आसन है ।
बस आछे लोगोका सात देते रहो ..स्वदेशी अपनावो