Monday, July 22, 2019

इल्लुमिनाति का भारत मे सामाजिक षणयंत्र।

हिन्दुओ के धर्म ग्रंथों और प्राचीन इतिहास पर संविधान के माध्यम से प्रतिबंध और 1858 Indian Education act द्वारा गुरुकुलों एवं संस्कृत भाषा का अंत।

संविधान की धारा 28,29,30A की धाराओं में साफ लिखा हुआ है की मुस्लिम मदरसे और इसाई स्कूल में कुरान बाइबिल पढ़ाया जा सकता है लेकिन किसी भी हिंदी स्कूल में वेद, गीता या रामायण,पुराण नहीं पढ़ाया जा सकता।

ऐसा मैं नहीं कह रहा, यह संविधान की धारा 28, 29, 30A में लिखा है।

यह पूरी तरह हिन्दूओ की सनातन संस्कृति को नष्ट करने का षड्यंत्र है इसे लागू करने में इल्लु ऐजेंट्स सफल भी हो गए।

भारत की देशी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने के उद्देश्य से ही सन 1858 में Indian Education Act की रूपरेखा बनाई गई थी जिसके अनुसार कान्वेंट स्कूल और इस्लामिक मदरसे तो चलाये जाएंगे पर सनातनी गुरुकुल और संस्कृत भाषा खत्म किये जायेंगे।

इसकी ड्राफ्टिंग इल्लु एजेंट ‘लोर्ड मैकोले’ ने की थी लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के
शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी।
मैकाले का एक अंग्रेज अधिकारी था G.W. Litnar और दूसरा था Thomas Munro दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था 1823 के आसपास की बात है ये Litnar जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था।
उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है।
उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता थी तब मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है और सनातन संस्कृति का अंत करना हो तो इनकी “देशी और सनातनी सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह “अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से सनातनी हिन्दू लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे । और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे और मैकाले ने एक मुहावरा इस्तेमाल किया कि "जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही भारत को जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी ।"                          इसलिए उसने 1858 के Act में सबसे पहले गुरूकुलों को गैरकानूनी घोषित किया जब गुरूकुल गैरकानूनी हो गये तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी और ठप कर दी गयी । फिर संस्कृत भाषा को गैरकानूनी घोषित किया गया और देश के सारे गुरूकुलों को घूम-घूम कर खत्म कर दिया गया , उनमें आग लगा दी गई और उसमें पढ़ाने वाले गुरूओं को मारा-पीटा जेल में डाल दिया गया । 1850 तक इस देश में '7 लाँख 32 हजार ' गुरूकुल हुआ करते थे और उस समय देश में लगभग इतने गाँव भी थे '7 लाँख 50 हजार ' मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरूकुल और ये जो गुरूकुल होते थे, वो सब के सब आज की भाषा में 'Higher Learning Institute ' हुआ करते थे उन सबमें 18 विषय पढ़ाया जाता था और ये गुरूकुल समाज के लोग मिलकर चलाते थे न कि राजा, महाराजा और इन गुरूकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी । इस तरह से इल्लु के इशारे पर सारे गुरूकुलों को खत्म कर दिया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया, कलकत्ता में पहला कॉन्वेन्ट कॉन्वेन्ट स्कूल खोला गया । उस समय इसे 'फ्री स्कूल' कहा जाता था इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाईं गयी । बम्बई यूनिवर्सिटी बनाईं गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाईं गयी और ये तीनों गुलामी के जमाने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं । भारत में आज साफ-साफ उस एक्ट का षड्यंत्र समझ आ रहा है यही कारण है कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है । अंग्रेजी में इसलिए बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, हम लोग तो खुद में हीन हो गये जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है दूसरों पर क्यां रोब पड़ेगा ?                                              लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है तो दुनिया में 204 देश है और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है?                                फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है, इन अंग्रेजों की जो बाईबल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे  !            ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अमरेक थी अमरेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती-जुलती है । समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी सयुक्त राष्ट्र संघ जो अमेरिका में है वहां की अंग्रेजी नही वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है ।                                               जो समाज अपनी मातृभाषा और संस्कृति से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही इल्लु की रणनीति थी, जो 200 वर्षिय रणनीति थी । अब इसका समय पूरा होने वाला है आज सनातन संस्कृति की दुर्दशा को देख लीजिए ।                                     आखिर किसके इशारे पर संविधान में धारा 28, 29, 30A हिन्दू विरोधी एक्ट को जगह दी गई ? जबकि संविधान निर्माता ज्यादातर हिन्दू थे ??                        आखिर किसके इशारे पर 1947 में 39000 बचे गुरूकुलों को 34 की संख्या में पहुँचा दिया गया ??                                               पहचानिये पर्दे के पीछे बैठे खिलाड़ियों को ?                                संज्ञानात्मक                                        😷😷😷🧐🧐🧐😇😇😇

Wednesday, July 17, 2019

लंकाधीश रावण कि मांग


(अद्भुत प्रसंग, भावविभोर करने वाला प्रसंग जरुर प्ढ़े)

बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी *महर्षि कम्बन की #इरामावतारम्'* मे यह कथा है।

रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है..।

जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं--

         खर दूसन मो   सम   बलवंता ।
         तिनहि को मरहि बिनु भगवंता।।

रावण के पास जामवंत जी को #आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..।
जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा। स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।

रावण ने सविनय कहा–   "आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।"

जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है।
" मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।"

प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया

  "क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?"

"बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है. I"

जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे?

रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा –" आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।"

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।

अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है।

" .यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। "

स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य।
यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया।
. स्वस्थ कण्ठ से "सौभाग्यवती भव" कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे ।

" आदेश मिलने पर आना" कहकर सीता को उन्होंने  विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे ।

जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

" दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! "

दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया ।

सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा

" यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।"

श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।

" अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?"

" कोई उपाय आचार्य ?"

                           
" आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।"

श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया। श्री रामादेश के परिपालन में. विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।
           
" अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान ..."

आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया।
गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह ?

यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।

आचार्य ने आदेश दे दिया - " विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।"

                     
जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया ।

     यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया।

आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।.

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की..

     श्रीराम ने पूछा - "आपकी दक्षिणा ?"

पुनः एक बार सभी को चौंकाया। ... आचार्य के शब्दों ने।

" घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है ..."

" लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।"

"आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे ....." आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।
         

"ऐसा ही होगा आचार्य।" यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी--
         
            “रघुकुल रीति सदा चली आई ।
            प्राण जाई पर वचन न जाई ।”
                      
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।
                 

रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ?

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )

*🙏🏼जय श्री राम  🙏🏼*
इस प्रसंग को पढ़ने का सादर  आभार.!! आचार्य संजीव भारद्वाज श्री सरस्वती कर्मकांड एवं ज्योतिष विद्यापीठ सरस्वती तीर्थ पिहोवा कुरुक्षेत्र

Sunday, July 14, 2019

उत्तर प्रदेश की रितु हैं ISRO के चंद्रयान-2 की मिशन डायरेक्टर, जानें कहां से की है पढ़ाई

ISRO का मून मिशन चंद्रयान-2 रविवार और सोमवार यानी 14 और 15 जुलाई 2019 की रात करीब 2.51 बजे लॉन्च होने वाला है। यह देश के लिए गौरव का पल होगा। लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए इन पलों की खुशी कुछ और ही होगी। क्योंकि इसरो के इस मून मिशन की लॉन्चिंग रितु करिधाल श्रीवास्तव के सुपरविजन में होगी जो उत्तर प्रदेश के लखनऊ की रहने वाली हैं। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए रितु कभी आईआईटी के पीछे नहीं भागीं। हम आगे आपको बता रहे हैं कि रितु ने किस स्कूल और कॉलेज से पढ़ाई की है और किस सादगी से इसरो की सीनियर साइंटिस्ट तक का सफर तय किया है...

रितु कहती हैं, 'तारों ने मुझे हमेशा अपनी ओर आकर्षित किया। मैं हमाशा सोचा करती थी कि अंतरिक्ष के अंधेरे के उस पार क्या है। विज्ञान मेरे लिए विषय नहीं जुनून था।' रितु ने इसरो में कई अहम प्रोजेक्ट किए। वह मंगलयान की डिप्टी ऑपरेशन डायरेक्टर भी रह चुकी हैं और इस प्रोजेक्ट को सबसे बड़ी चुनौती मानती हैं।

रितु की पढ़ाई

रितु कारिधाल का पालन-पोषण लखनऊ के ही मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ है। उन्होंने नवयुग गर्ल्स कॉलेज से इंटर करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। यहां उन्होंने फिजिक्स से ग्रेजुएशन और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद रितु ने GATE पास कर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेस (IISc) बेंगलुरू में दाखिला लिया। यहां रितु ने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में डिग्री ली।  
वर्ष 1997 में रितु इसरो से जुड़ीं। 

रितु का परिवार

इतना ही नहीं यूजी व पीजी के बाद रितु ने लखनऊ विश्वविद्यालय से ही फिजिक्स में पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया। उन्हें अपने ही विभाग में पढ़ाने का मौका भी मिला। लेकिन उन्हें पीएचडी करते हुए छह महीने ही हुए थे कि उन्होंने गेट (GATE) क्वालिफाई कर लिया। फिर एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स के लिए बेंगलुरू चली गईं।

रितु लखनऊ में राजाजीपुरम की रहने वाली हैं। माता-पिता का निधन हो चुका है। माता-पिता के बाद रितु ने ही अपने छोटे भाई-बहन का ख्याल रखा। रितु के दो बच्चे भी हैं जिनका वह अच्छी तरह ध्यान रखती हैं। भाई रोहित कहते हैं, हमें नाज है अपनी बहन पर। वह निजी जीवन में जितनी पारंपरिक है, काम के मामले में उतनी ही प्रोफेशनल। ज्यादा कुछ कहने से बेहतर है कि हम देश के इस मिशन की सफलता के लिए प्रार्थना करें।

Saturday, July 13, 2019

मोहन जोदड़ो की खुदाई

स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेजों की मान्यता का प्रचार क्यों हो रहा है, यह इस घटना से समझिए !!!

लेखक: राजेशार्य आट्टा

वैदिक विद्वानों- आचार्य उदयवीर व डाॅ0 फतहसिंह ने मोहन जोदड़ो की खुदाई से प्राप्त सील (मुद्रा) पर अंकित एक चित्र को ऋग्वेद के मंत्र (1/164/20) की व्याख्या बताया है, जिसमें प्रकृति रूपी वृक्ष पर आत्मा और परमात्मा नाम के दो पक्षी बैठे हैं। इनमें से एक (आत्मा) वृक्ष के फल खा रहा है, जबकि दूसरा (परमात्मा) केवल देख रहा है। इससे इन्होंने सिंधु सभ्यता को वैदिक सभ्यता सिद्ध कर दिया पर नेहरूजी की सरकार ने इन्हें हतोत्साहित कर दिया। डाॅ0 फतहसिंह ने सिंधु लिपि के 45 अक्षरों की खोज करके 1965 ई0 तक 1500 सिंधु मुद्राओं को पढ़ा और निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि सिंधु मुद्राओं की लिपि पूर्व ब्राह्मी है और भाषा वैदिक संस्कृत। वे सिंधु लिपि के ओम्, उमा, इंद्र, अग्नि, मित्र, वरुण आदि वैदिक शब्दों को पढ़ सके। उनका यह भी कहना था कि उपनिषदों के अनेक विचारों को सिंधु मुद्राओं में चित्रित किया गया है। सन 1967 ई0 में उन्हें महाविद्यालय से स्थानांतरित कर राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान का 75 वर्ष की अवस्था तक के लिए निदेशक बनाया गया था। जब उन्होंने सिंधु सभ्यता को वैदिक सभ्यता सिद्ध किया तो उन पर दबाव डाला गया कि वे इसे फादर हेरास आदि विदेशी विद्वानों के अनुरूप द्रविड़ सभ्यता ही सिद्ध करें। उनके मना करने पर जनवरी 1970 ई0 (57 वर्ष) में ही उन्हें हटा दिया गया। जब ये अपने गांव जिला पीलीभीत में थे तो खनौत नदी से चांदी के सिक्कों से भरा ताम्रपात्र चरवाहों को मिला था, जिसमें से 20 सिक्के किसी इतिहासप्रेमी अधिकारी ने साफ करवा कर इनके पास भेज दिये। उन्होंने उन पर राम, सीता, लक्ष्मण आदि के नाम व चित्र देखकर उन्हें सिंधु घाटी वाली लिपि में वैदिक सभ्यता सिद्ध करते हुए उत्तर प्रदेश की सरकारी पत्रिका ‘त्रिपथगा’ में लेख भेजें । लखनऊ के संग्रहालय में रखें सिक्कों को भी पढ़ने के लिए उनके फोटो मांगें तो इन्हें मना कर दिया गया और त्रिपथगा में इनके लेख छापना बंद कर दिये गये । इसके डाॅ फतेहसिंह ने इस विषय पर महाविद्यालयों में व्याख्यान दिए, पर लकीर के फकीर प्रोफेसर उन्हें कोई महत्व नहीं देते थे । उनके लिए विदेशी विद्वान ही सर्वज्ञ थे ।                                                     डॉ फतेहसिंह ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी) से सिंधु सभ्यता के वैदिक आधार पर शोध करने के लिए आर्थिक सहायता मांगी तो इन्हें उत्तर मिला कि हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि के चिन्हों को वैदिक की बजाय द्रविड़ घोषित करों और यह सिद्ध करों कि ऋग्वेद में अशुद्धियां है, इसका पुनर्लेखन होना चाहिए । डाॅ साहब ने लिखा कि "मैं ऋग्वेद के पुनर्गठन पर तो काम नहीं करूंगा, क्योंकि इस पर तो फादर एस्टलर कर रहे हैं, पर मैं ऋग्वैदिक विचारधारा के पुनर्गठन पर कार्य कर सकता हूँ ।' इस पर उन्हें अनुदान देने से मना करते हुए उत्तर मिला- 'खेद है कि आयोग आपकी योजना को स्वीकार नहीं कर सकता ।' क्योंकि सरकार को चाटुकार चाहिए थे, सच्चे इतिहासकार नहीं ।                                                  (13 जुलाई/ डॉ फतेहसिंह के जन्म-दिवस पर विशेष रूप से प्रकाशित)                                            😎😎😎😇😇😇😥

Tuesday, July 9, 2019

एक *चूहा* एक कसाई

एक *चूहा* एक कसाई के घर में बिल बना कर रहता था।

एक दिन *चूहे* ने देखा कि उस कसाई और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं। चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है।

उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक *चूहेदानी* थी।

ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर *कबूतर* को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है।

कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?

निराश चूहा ये बात *मुर्गे* को बताने गया।

मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई.. ये मेरी समस्या नहीं है।

हताश चूहे ने बाड़े में जा कर *बकरे* को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।

उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई, जिस में एक ज़हरीला *साँप* फँस गया था।

अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस कसाई की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डस लिया।

तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने हकीम को बुलवाया। हकीम ने उसे *कबूतर* का सूप पिलाने की सलाह दी।

कबूतर अब पतीले में उबल रहा था।

खबर सुनकर उस कसाई के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन उसी *मुर्गे* को काटा गया।

कुछ दिनों बाद उस कसाई की पत्नी सही हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो *बकरे* को काटा गया।

*चूहा* अब दूर जा चुका था, बहुत दूर ……….।

_*अगली बार कोई आपको अपनी समस्या बतायेे और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है, तो रुकिए और दुबारा सोचिये।*_

*_समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा समाज व पूरा देश खतरे में है।_*

_अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये। स्वयं तक सीमित मत रहिये। सामाजिक बनिये.."_✍🏻

Monday, July 8, 2019

जो शहीद हुवे हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी


" गुलाम संयुक्त भारत " को " अंग्रेज सरकार " से " भारत माता को गुलामी की बेड़ी से आज़ाद करवाने वाले " अनगिनत क्रांतिकारी, देशभक्तों की सूची
जिन्होंने अपनी जान की कीमत चुकाकर " वन्दे मातरम " का जयघोष कर फांसी की बलिवेदी पर हंसते-हंसते चढ़ गए। उन देशभक्त क्रांतिकारियों को नमन, श्रद्धा सुमन।

प्रस्तुति : सुभाष पांडेय / भायंदर✍

(साभार : " मृत्युंजयी "
लेखक - स्वतंत्रता सेनानी पंडित रतनलाल जोशी की पुस्तक द्वारा  एवं  हिंदी साप्ताहिक :" क्राइम फेस " दिनांक 19 अगस्टस 1 सितंबर 2014 के अंक में प्रकाशित क्रांतिकारियों की सूची)

क्रांतिकारियों के नाम - बलिदान दिवस
1) मंगल पांडेय - 08 /अप्रैल/1857
2) हुकुमचंद जैन -19/जनवरी/1858
3)कुंवर सिंह-26/अप्रैल/1858
4)लक्ष्मीबाई-28/जून/1858
5)अमरचंद बाठीया-22/जून/1858
6)तात्या टोपे-18/अप्रैल/1859
7)राव तुलाराम-23/अगस्त/1863
8)शेर अली-08/फरवरी/1872
9)वासुदेव बलवंत फड़के-17/फरवरी/1883
10)दामोदर हरि चाफेकर-18/अप्रैल/1868
11)वासुदेव हरि चाफेकर-08/मई/1899
12)महादेव विनायक रानडे-10/मई/1899
13)बालकृष्ण हरि चाफेकर-12/मई/1899
14)बिरसा मुंडा-02/जून/1900
15)प्रफुल्ल चाकी-01/मई/1908
16)खुदीराम बोस-11/अगस्त/1908
17)कनाईलाल दत्त-10/नवंबर/1908
18)सत्येन्द्रनाथ बसु-21/नवंबर/1908
19)मदनलाल धींगड़ा-17/अगस्त/1909
20)वीरेंद्रनाथ दत्त गुप्त-21/फरवरी/1910
21)अनंत लक्ष्मण कान्हेरे-19/अप्रैल/1910
22)कृष्ण गोपाल कर्वे-19/अप्रैल/1910
23)विनायक नारायण देशपांडे-19/अप्रैल/1910
24)वांची अय्यर-17/जून/1911
25)इंद्रभूषण राय-26/अप्रैल/1912
26)सूफी अम्बा प्रसाद-21/फरवरी/1915
27)काशीराम-27/मार्च/1915
28)अमीरचंद-08/मई/1915
29)बालमुकुंद-08/मई/1915
30)अवध बिहारी-08/मई/1915
31)वसंत कुमार विश्वास-11/मई/1915
32)यतीन्द्रनाथ मुखोउपाध्याय-10/अक्टूबर/1915
33)करतार सिंह 'सराबा'-16/नवंबर/1915
34)विष्णु गणेश पिंगले-16/नवंबर/1915
35)सोहनलाल पाठक-10/फरवरी/1916
36)मथुरा सिंह-27/मार्च/1917
37)रामचंद्र भारतद्वाज-23/अप्रैल/1918
38)प्रताप सिंह-07/मई/1918
39)राम रक्खा-08/जून/1918
40)तारिणी मजूमदार-15/जून/1918
41)नलिनी बागची-16/जून/1918
42)गोपी मोहन(नाथ साहा)-01/मार्च/1924
43)अल्लुरि सीताराम राजू-07/मई/1924
44)ज्योतिष चंद्र पाल-04/दिसंबर/1924
45)अनन्त हरि मित्र-28/अक्टूबर/1926
46)प्रमोद रंजन चौधरी-28/अक्टूबर/1926
47)राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी-17/दिसंबर/1927
48)रामप्रसाद बिस्मिल-19/दिसंबर/1927
49)अशफ़ाक़ उल्ला खान-19/दिसम्बर/1927
50)रोशन सिंह-19/दिसम्बर/1927
51)यतीन्द्रनाथ दास-13/अक्टूबर/1929
52)अमरेंद्र नन्दी-24/अप्रैल/1930
53)भगवती चरण-28/मई/1930
54)शालिग्राम शुक्ल-01/दिसम्बर/1930
55)सुधीर गुप्त "बादल"-06/दिसम्बर/1930
56)विनय कृष्ण बसु-13/दिसम्बर/1930
57)दिनेश गुप्त-07/जुलाई/1931
58)राम शरण लाल शर्मा-31/जनवरी/1930
59)श्यामजी कृष्ण वर्मा-31/मार्च/1930
60)श्रीकृष्ण सारदा-12/जनवरी/1931
61)मलप्पा धनशेट्टी-12/जनवरी/1931
62)जगनाथ शिंदे-12/जनवरी/1931
63)अब्दुल रसूल कुर्बान हुसैन-12/जनवरी/1931
64)चंद्रशेखर " आज़ाद "-27/फरवरी/1931
65)भगतसिंह - 23/मार्च/1931
66)राजगुरू-23/मार्च/1931
67)सुखदेव-23/मार्च/1931
68)जगदीश बहल-03/मई/1931
69)हरिकृष्ण तलवार-09/जून/1931
70) ऋषिकेश लाटा-03/फरवरी/1930
71)कनाईलाल भट्टचार्या -27/जुलाई/1931
72)रामबाबू-06/जून/1931
73)रामकृष्ण विश्वास-04/अगस्त/1931
74)निर्मल सेन-13/जून/1932
75)प्रीतिलता वादैदार-24/जून/1932
76)प्रदोतकुमार भट्टाचार्या-12/जनवरी/1933
77)रोशनलाल मेहरा-01/मई/1933
78)महावीर सिंह-17/मई/1933
79)मोहन किशोर नमोदास-26/मई/1933
80)मोहित मोहन मैत्र-28/मई/1933
81)अनाथ बंधु पांजा-02/अक्टूबर/1933
82)मृगेंद्रनाथ दत्त-02/अक्टूबर/1933
83)बृजकिशोर चक्रवती-25/अक्टूबर/1934
85)रामकृष्ण राय-25/अक्टूबर/1934
86)निर्मल जीवन घोष-26/अक्टूबर/1934
87)सूर्यसेन-12/जनवरी/1934
88)तारकेश्वर दस्तीदार-12/जनवरी/1934
89)वैकुंठ शुक्ल-14/मई/1934
90)चम्पक रमन पिल्लई - 14 /मई /1934
91)प्रीतम खान दुवा-18/मई/1934
91)कृष्ण चौधरी-05/जून/1934
92)दिनेशचंद्र मजूमदार-09/जून/1934
93)मणीन्द्रनाथ बनर्जी-20/जून/1934
94)असित भट्टाचार्या-02/जुलाई/1934
95)मोती मल्लिक-15/दिसम्बर/1934
96)भवानी भट्टाचार्य-03/फरवरी/1935
97)अवनिनाथ मुखर्जी-28/दिसम्बर/1937
98)लाला हरदयाल-04/जून/1939
99)उधम सिंह-12/जून/1940
100)नयनूराम शर्मा-14/अक्टूबर/1941
101)बालमुकुंद बिस्सा-19/जून/1942
102)कनकलता बरुआ-20/जून/1942
103)भोगेश्वर फुकनानी-29/सितम्बर/1942
104)मातांगिनी हाजरा-29/सितंबर/1942
105)हेमू कालानी-21/जनवरी/1943
106)शचीन्द्रनाथ सान्याल-06/फरवरी/1943
107)वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय-06/अप्रैल/1943
108)मानवकुमार बसु ठाकुर-25/सितंबर/1943
109)गोपाल सेन-29/सितंबर/1944
110)रासबिहारी बोस-21/जनवरी/1945
111)नेताजी सुभाषचंद्र बोस-18/अगस्त/1945
112)सागरमल गोपा-03/अप्रैल/1946
113)बीरबल सिंह-01/जुलाई/1946
114)करणी राम-13/अगस्त/1952
115)रामदेव सिंह-13/अगस्त/1952
116)ब्रजनन्दन शर्मा-15/अगस्त/1955

" दुनियाँ में सबसे सुंदर जीने का मधुर तकाज़ा
ए शहीद ! उठने दे अपना फूलों भरा जनाजा "

(*शहीद भगत सिंह स्मारक समिति, आगरा, उत्तरप्रदेश के सौजन्य से)