Monday, August 5, 2019

धारा 370"( पढ़ कर आगे औरों के शेयर करे) "जरूर जानिए"


जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है ।
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जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है
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जम्मू - कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है

जबकी भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5
वर्ष का होता है ।
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जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है ।
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भारत के उच्चतम न्यायलय के आदेश जम्मू - कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं
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भारत की संसद को जम्मू - कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यंत सीमित
क्षेत्र में कानून बना सकती है ।
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जम्मू कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के
व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी ।
इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के
किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू - कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी ।
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और
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धारा 370 की वजह से कश्मीर में RTI लागु नहीं है ।
RTE लागू नहीं है ।
CAG लागू नहीं होता ।
भारत का कोई भी कानून लागु नहीं होता ।
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कश्मीर में महिलाओ पर शरियत कानून लागु है ।
कश्मीर में पंचायत के अधिकार नहीं ।
कश्मीर में चपरासी को 2500 ही मिलते है.

कश्मीर में अल्पसंख्यको [ हिन्दू- सिख ] को 16 % आरक्षण नहीं मिलता ।
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धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते है ।
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धारा 370 की वजह से ही पाकिस्तानियो को भी भारतीय
नागरीकता मिल जाता है ।

इसके लिए पाकिस्तानियो को केवल किसी कश्मीरी लड़की से
शादी करनी होती है ।
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अच्छी शुरुवात है कम से कम 370 हटाने की दिशा में एक कदम आगे की ओर मोदी जी को धन्यवाद जो उन्होनें धारा 370
का मुद्दा उठाया ।

अब यदि कोई सेकुलर इन तथ्यों के विषय में कुछ कहना चाहे
तो स्वागत हैं...!!!
370 धारा हटाना ही है.... इसलिए मेसेज को ज्यादा से ज्यादा फैलाओ
कश्मीर में आप
तिरंगा नहीं फहरा सकते,

कन्याकुमारी में रिक्शे के पीछे आप जय श्री राम नहीं लिख सकते,

हैदराबाद में मन्दिर की आप
घंटी नहीं बजा सकते,

कलकत्ता में आप अपने घर के दरवाजे पर
बजरंगबली की मूर्ति नहीं लगा सकते.

फिर कैसे कहूं की कश्मीर से
कन्याकुमारी तक भारत एक है ??

65 सालो के इतिहास में :-
पहली बार जिसने खुल के 370 का विरोध किया हे । तो उसका साथ दीजिये ।

आपको सिर्फ 3 लोगो को मेसेज जरुर करना है , जनहित का ये मेसेज सिर्फ आप सब के पढने के लिए नहीं है.... आगे क्या करना है इस मेसेज का, आप खुद समझदार है

भारत माता की जय

Friday, August 2, 2019

ब्राह्मण शब्द को लेकर भ्रांतियां एवं उनका निवारण

डॉ विवेक आर्य

ब्राह्मण शब्द को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। इनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है।  क्यूंकि हिन्दू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी जातिवाद है।  ब्राह्मण शब्द को सत्य अर्थ को न समझ पाने के कारण जातिवाद को बढ़ावा मिला है।

शंका 1 ब्राह्मण की परिभाषा बताये?

समाधान-

पढने-पढ़ाने से,चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से,परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद,विज्ञान आदि पढने से,कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है।-मनुस्मृति 2/28
                                     

शंका 2 ब्राह्मण जाति है अथवा वर्ण है?

समाधान- ब्राह्मण वर्ण है जाति नहीं। वर्ण का अर्थ है चयन या चुनना और सामान्यत: शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है। व्यक्ति अपनी रूचि, योग्यता और कर्म के अनुसार इसका स्वयं वरण करता है, इस कारण इसका नाम वर्ण है। वैदिक वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण है।  ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

ब्राह्मण का कर्म है विधिवत पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना, दान प्राप्त करना और सुपात्रों को दान देना।

क्षत्रिय का कर्म है विधिवत पढ़ना, यज्ञ करना, प्रजाओं का पालन-पोषण और रक्षा करना, सुपात्रों को दान देना, धन ऐश्वर्य में लिप्त न होकर जितेन्द्रिय रहना।

वैश्य का कर्म है पशुओं का लालन-पोषण, सुपात्रों को दान देना, यज्ञ करना,विधिवत अध्ययन करना, व्यापार करना,धन कमाना,खेती करना।

शुद्र का कर्म है सभी चारों वर्णों के व्यक्तियों के यहाँ पर सेवा या श्रम करना।

शुद्र शब्द को मनु अथवा वेद ने कहीं भी अपमानजनक, नीचा अथवा निकृष्ठ नहीं माना है। मनु के अनुसार चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य एवं शूद्र आर्य है।-   मनु 10/4
                                                                                                          

शंका 3- मनुष्यों में कितनी जातियाँ हैं?                                                        समाधान- मनुष्यों में केवल एक ही जाति है, वह है "मनुष्य " । अन्य की जाति नहीं है ।                             शंका 4 - चार वर्णों का विभाजन का आधार क्यां है?                               समाधान- वर्ण बनाने का मुख्य प्रयोजन कर्म विभाजन है । वर्ण  विभाजन का आधार व्यक्ति की योग्यता है । आज भी शिक्षा प्राप्ति के उपरांत व्यक्ति डाॅक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनता है, जन्म से कोई भी व्यक्ति डाॅक्टर, इंजीनियर, वकील आदि नहीं होता । इसे ही वर्ण व्यवस्था कहते हैं ।                                              शंका 5 - कोई भी ब्राह्मण जन्म से होता है अथवा गुण, कर्म, स्वभाव से होता है?                                         समाधान- व्यक्ति की योग्यता का निर्धारण शिक्षा प्राप्ति के उपरांत ही होता है, जन्म के आधार पर नहीं होता । किसी भी व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर उसके वर्ण का चयन होता है । कोई व्यक्ति अनपढ़ हो अपने आप को ब्राह्मण कहे तो वह गलत है ।                                            मनु का उपदेश पढ़िये- जैसे लकड़ी से बना हाथी और चमड़े से बना हिरण सिर्फ नाम के लिए हांथी और हिरण कहे जाते हैं वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण मात्र नाम का ही ब्राह्मण होता है । मनुस्मृति- 2/157                                     शंका 6 - क्यां ब्राह्मण पिता की संतान केवल इसलिए ब्राह्मण कहलाती है कि उसके पिता ब्राह्मण हैं?                                           समाधान- यह भ्रांति है कि ब्राह्मण पिता की संतान इसलिए ब्राह्मण कहलायेगी क्योंकि उसका पिता ब्राह्मण हैं । जैसे एक डाक्टर की संतान तभी डाॅक्टर कहलायेगी जब वह MBBS उत्तीर्ण कर लेगी । जैसे एक इंजिनीयर की संतान तभी इंजीनियर कहलायेगी जब वह BTech उत्तीर्ण कर लेगी, बिना पढ़े नहीं कहलायेगी । वैसे ही ब्राह्मण एक अर्जित जाने वाली पुरानी उपाधि है।                               मनु का उपदेश पढ़िये- माता-पिता से उत्पन्न संतति का माता के गर्भ से प्राप्त जन्म साधारण जन्म है । वास्तविक जन्म तो शिक्षा पूर्ण कर लेने के उपरांत ही होता है । मनुस्मृति- 2/147                                                  शंका 7 - प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए क्यां करना पड़ता था?                                                         समाधान- प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए शिक्षित और गुणवान दोनों होना पड़ता था ।                                                     मनु का उपदेश देखें- वेदों में पारंगत आचार्य द्वारा शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के उपरांत ही उसका वास्तविक मनुष्य जन्म होता है । मनुस्मृति-2/148                                         ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्यालय से दुसरा जन्म प्राप्त करते हैं । विद्याध्ययन न कर पाने वाला, शुद्र चौथा वर्ण है । मनुस्मृति-10/4                                   आजकल कुछ लोग केवल इसलिए अपने आप को ब्राह्मण कहकर जाति का अभिमान दिखाते हैं क्यूंकि उनके पूर्वज ब्राह्मण थे । जो गलत है ! योग्यता अर्जित किये बिना कोई ब्राह्मण नहीं बन सकता । हमारे प्राचीन ब्राह्मण अपने तप से, अपनी विद्या से अपने ज्ञान से सम्पूर्ण संसार का मार्गदर्शन करते थे । इसलिए हमारे आर्यव्रत देश विश्व गुरु था ।                                                    शंका 8 - ब्राह्मण को श्रेष्ठ क्यों माने?                                                       समाधान- ब्राह्मण एक गुणवाचक वर्ण है । समाज का सबसे ज्ञानी, बुद्धिमान, शिक्षित, समाज का मार्गदर्शन करने वाला, त्यागी, तपस्वी व्यक्ति ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी बनता है । इसलिए ब्राह्मण वर्ण श्रेष्ठ है । वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण को अगर सबसे अधिक सम्मान दिया गया है तो ब्राह्मण को सबसे अधिक गलती करने पर दंड भी दिया गया है ।                                      मनु का उपदेश देखें- एक ही अपराध के लिए शूद्र को सबसे कम दंड, वैश्य को दो गुना, क्षत्रिय को तीन गुना और ब्राह्मण को सोलह या 128 गुना दंड मिलता था । मनु- 8/337 ,8/338                                                   इन श्लोकों के आधार पर कोई भी मनु महाराज को पक्षपाती नहीं कह सकता ।                                   शंका 9 - क्यां शुद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शुद्र बन सकता है?                        समाधान- ब्राह्मण, शूद्र आदि वर्ण क्योंकि गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर विभाजित है । इसलिए इनमें परिवर्तन संभव है । कोई भी व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं होता। अपितु शिक्षा प्राप्ति के उपरांत उसके वर्ण का निर्धारण होता है ।                                     मनु का उपदेश देखें- ब्राह्मण शुद्र बन सकता है और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है । इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं । मनुस्मृति- 10/64                शरीर और मन से शुद्ध-पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्राह्मण जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है । मनुस्मृति-9/335                                जो मनुष्य नित्य प्रातः और सायं ईश्वर अराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए । मनुस्मृति-2/103                                     जब व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है । मनुस्मृति-2/172                   ब्राह्मण-वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ठ-अतिश्रेष्ठ व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच-नीचतर व्यक्तियों का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ठ बनता जाता है । इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है । मनुस्मृति-4/245                                           जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन या पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है । मनुस्मृति - 2/168                                  शंका 10- क्यां जो आज अपने आप को ब्राह्मण कहते हैं, वही हमारी प्राचीन विद्या और ज्ञान की रक्षा करने वाले प्रहरी थे?             समाधान- आजकल जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर अगर प्राचीन ब्राह्मणों के समान वैदिक धर्म की रक्षा के लिए पुरुषार्थ कर रहा है तब तो वह निश्चित रूप से ब्राह्मण के समान सम्मान का पात्र है । अगर कोई व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण धर्म के विपरीत कर्म कर रहा है, तब वह किसी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं है । एक उदाहरण लीजिए! एक व्यक्ति यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है, शाकाहारी हैं, और धर्म के लिए पुरुषार्थ करता है । उसका वर्ण ब्राह्मण कहलायेगा चाहे वह शूद्र पिता की संतान हो । उसके विपरीत एक व्यक्ति अनपढ़ है, मांसाहारी हैं, चरित्रहीन है और किसी भी प्रकार से समाज हित का कोई कार्य नहीं करता, चाहे उसके पिता कितने भी प्रतिष्ठित ब्राह्मण हो, किसी भी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं है । केवल चोटी पहनना, जनेऊ धारण करने भर से कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता । इन दोनों वैदिक व्रतों से जुड़े हुए कर्म अर्थात धर्म का पालन करना अनिवार्य है । प्राचीन काल में धर्म रूपी आचरण एवं पुरुषार्थ के कारण ब्राह्मणों का मान था ।                                   इस लेख के माध्यम से वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण शब्द को लेकर सभी भ्रांतियों के निराकरण का प्रयास किया है । ब्राह्मण शब्द की वेदों में बहुत महत्ता है । मगर इसकी महत्ता का मुख्य कारण जन्मना ब्राह्मण होना नहीं अपितु कर्मणा ब्राह्मण होना हैं । मध्यकाल में हमारी वैदिक वर्ण व्यवस्था बदलकर जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गयी । विडंबना यह है कि इस बिगाड़ को हम आज भी दोह रहें हैं । जातिवाद से हिन्दू समाज की एकता समाप्त हो गयी, भाई-भाई में द्वेष हो गया । इसी कारण से हम कमजोर हुए तो विदेशी विधर्मियों के गुलाम बने । हिन्दुओं के 1200 वर्षों के दमन का अगर कोई मुख्य कारण है तो वह जातिवाद हैं । वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु है । इस जातिवाद रूपी शत्रु को जड़ से नष्ट करने का संकल्प लें !!!                      😴😴😴😌😌😌🙂🙂🙂

Saturday, July 27, 2019

In Mahabharat, Karna asks Lord Krishna

In Mahabharat, Karna asks Lord Krishna - "My mother left me the moment I was born. Is it my fault I was born an illegitimate child?

I did not get the education from Dhronacharya because I was considered not a Kshatriya.

Parsuraam taught me but then gave me the curse to forget everything when he came to know I was  Son of Kunthi belong to Kshatriya.

A cow was accidentally hit by my arrow & its owner cursed me for no fault of mine.

I was disgraced in Draupadi's Swayamvar.

Even Kunthi finally told me the truth only to save her other sons.

Whatever I received was through Duryodhana's charity.

So how am I wrong in taking his side ???"

**Lord Krishna replies, "Karna, I was born in a jail.

Death was waiting for me even before my birth.

The night I was born I was separated from my birth parents.

From childhood, you grew up hearing the noise of swords, chariots, horses, bow, and arrows. I got only cow herd's shed, dung, and multiple attempts on my life even before I could walk!

No Army, No Education. I could hear people saying I am the reason for all their problems.

When all of you were being appreciated for your valour by your teachers I had not even received any education. I joined Gurukula of Rishi Sandipani only at the age of 16!

You are married to a girl of your choice. I didn't get the girl I loved & rather ended up marrying those who wanted me or the ones I rescued from demons.

I had to move my whole community from the banks of Yamuna to far off Sea shore to save them from Jarasandh. I was called a coward for running away!!

If Duryodhana wins the war you will get a lot of credit. What do I get if Dharmaraja wins the war? Only the blame for the war and all related problems...

Remember one thing, Karna. Everybody has Challenges in life to face.

LIFE IS NOT FAIR & EASY ON ANYBODY!!!

But what is Right (Dharma) is known to your Mind (conscience). No matter how much unfairness we got, how many times we were Disgraced, how many times we Fall, what is important is how you REACTED at that time.

*Life's unfairness does not give you license to walk the wrong path...*

Always remember, Life may be tough at few points, but DESTINY is not created by the SHOES we wear but by the STEPS we take...

Thursday, July 25, 2019

डकैत की माँ

खटाक खटाक दो बार दरवाजे पर आवाज हुई .... देखो इतनी रात कौन आया है , मुखिया ने बीबी से कहा

जब उसने दरवाजा खोला तो सफ़ेद साड़ी में लिपटी हुई एक कृशकाय औरत काँप रही थी .... कुछ खाने को मिलेगा ? .... उन्होंने दरवाजा खोलने वाली औरत से मनुहार किया ....

चल भाग बुढ़िया यहाँ से .... कहकर उसने दरवाजा बन्द करना चाहा लेकिन वो बुढ़िया पैरों में गिर पड़ी .... और थोड़े से नमक की ही मनुहार करने लगी जिससे वो पास रखा कोदों खा सके लेकिन उसकी ना सुनी गयी और दरवाजा खटाक से बन्द हो गया

वो बुढ़िया और कोई नहीं बल्कि महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमर शहीद पंडित चन्द्र शेखर तिवारी "आज़ाद" की माँ जगरानी देवी थी

आज़ाद के शहीद होने के बाद जगरानी देवी का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया गया , गुलामी के जूते चाटते चाटते अंधे हो चुके ग्रामीणों द्वारा एक शहीद की माँ को डकैत की माँ कहकर बुलाया जाता रहा .... दुःख की बात ये है कि ये चीज़ देश के "आज़ाद" होने के बाद भी 1949 तक जारी रही

1949 में आज़ाद के सबसे विश्वासपात्र सैनिक सदाशिव ने जगरानी देवी को ढूंढ़ निकाला और अपने साथ झाँसी ले गए और अपने सेनापति की माँ को सगे बेटे से बढ़कर प्यार दिया और उनकी आस्थाओं के हिसाब उनको कंधे पर बिठाकर तीर्थयात्राएं कराई और उनको वो सारा सम्मान दिया जिसकी वो हक़दार थीं

1931 में नेहरू की मुखबिरी करने के कारण चंद्रशेखर आज़ाद के शहीद हो जाने पर जगरानी देवी पर मानों पहाड़ टूट पड़ा हो , जिसके मात्र 25 वर्षीय एकलौते बेटे ने मातृभूमि की सेवा के लिए अपनी जान दे दी हो उसके चरणों का पानी भी अमृत समझा जाना चाहिए लेकिन उनके साथ उसी वक़्त से सौतेला व्यवहार शुरू हो गया , आज़ाद के जाने के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एशोसिएशन ख़त्म हो गयी , सदाशिव को भी कालेपानी की सजा सुना दी गयी और फिर जगरानी देवी के दुर्दिन दिन शुरू हो गए जो लगातार 18 वर्षों तक जारी रहे ....वो जंगल से लकड़ी काटकर बेचतीं थीं और फिर बाजरा लाकर उसका घोल बनाकर पीतीं थीं किसी तरह उन्होंने अपने ज़िन्दगी के 18 वर्ष व्यतीत किये ... सदाशिव के कालेपानी की सजा ख़त्म होने के बाद उन्होंने जगरानी देवी को ढूंढ़ा और अपने साथ ले गए

जगरानी देवी के हृदय में अक्सर यह कसक रहती थी कि जिस देश के लिए उनके बेटे ने अमर बलिदान दिया उसी देश ने उन्हें भुला दिया .... और यही कसक लिए वो मार्च 1951 में इस संसार से विदा हो गयी

आज ही 23 जुलाई 1906 को इस माँ ने आज़ाद को जन्म दिया था ,

जब तक जिया.. मूछों पे ताव था,
गुलाम देश में वो एकलौता आज़ाद था ।

जयंती पर चंद्रशेखर आज़ाद जी को शत शत नमन 🙏🏻🙏🏻

शहीदों के चिताओं पर अब लगते नहीं मेले
वतन पर मिटने वालों का निशां अब कहाँ बाकी है

Wednesday, July 24, 2019

“मेरी ढाई शंका”

*एक चर्चित इस्लामिक स्टाल पर कुछेक लोगों की भीड़ देखकर मैं भी पहुँच गया। पता चला 'कुरान-ए-शरीफ़' की प्रति लोगों को मुफ़्त बाँटी जा रही है। शांति, प्रेम और आपसी मेलजोल को इस्लाम का संदेश बताया जा रहा था।*

*खैर जिज्ञासावश मैंने भी मुफ़्त में कुरान पाने को उनका दिया आवेदन फॉर्म भरने की ठानी जिसमें वो नाम-पता और मोबाइल नम्बर लिखवा रहे थे ताकि बाद में लोगों से सम्पर्क साधा जा सके।*

*एकाएक एक सज्जन अपनी धर्मपत्नी जी के साथ स्टाल में पधारे सामान्य अभिवादन से पश्चात उन्होंने मुस्लिम विद्वान् के सामने अपना विचार रखा - मैं अपनी धर्मपत्नी के साथ इस्लाम स्वीकार करना चाहता हूँ।*

*यह सुन मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर प्रसन्नत्ता की अनूठी आभा दिखाई दी।*
*मुस्लिम धर्मगुरु ने अपने दोनों हाथ खोलकर कहा - आपका स्वागत है।*
*लेकिन उन सज्जन ने कहा - इस्लाम स्वीकार करने से पहले मेरी 'ढाई' शंका है। आपको उनका निवारण करना होगा। यदि आप उनका निवारण कर पाए तो ही मैं इस्लाम स्वीकार कर सकता हूँ !!!*

*मुस्लिम विद्वान ने शंकित से भाव से उनकी ओर देखते हुए प्रश्न किया - महोदय, शंका या तो 'दो' हों या 'तीन'! ये 'ढाई' शंका का क्या तुक है?*
*सज्जन ने अपने मुस्कुराते हुए कहा - जब मैं शंका रखूँगा आप खुद समझ जायेंगे। यदि आप तैयार हो तो मैं अपनी पहली शंका आपके सामने रखूँ?*
*मुस्लिम विद्वान् ने कहा - जी, रखिये...*

*सज्जन - मेरी पहली शंका है कि सभी इस्लामिक बिरादरी के मुल्कों में जहाँ मुस्लिमों की संख्या 50 फीसदी से ज़्यादा है, मसलन 'मुस्लिम समुदाय' बहुसंख्यक हैं, उनमें एक भी देश में 'समाजवाद' नहीं है, 'लोकतंत्र नहीं है। वहाँ अन्य धर्मों में आस्था रखनेवाले लोग सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश में 'मुस्लिम' बहुसंख्यक होते हैं वहाँ कट्टर इस्लामिक शासन की माँग होने लगती है। मतलब उदारवाद नहीं रहता, लोकतंत्र नहीं रहता। लोगों से उनकी अभिवयक्ति की स्वतंत्रता छीन-सी ली जाती है। आप इसका कारण स्पष्ट करें, ऐसा क्यों? मैं इस्लाम स्वीकार कर लूँगा !!!*

*मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर एक शंका ने हजारों शंकाए खड़ी कर दीं। फिर भी उन्होंने अपनी शंकाओं को छिपाते हुए कहा - दूसरी शंका प्रकट करें...*

*सज्जन – मेरी दूसरी शंका है, पूरे विश्व में यदि वैश्विक आतंक पर नज़र डालें तो इस्लामिक आतंक की भागीदारी 95% के लगभग है। अधिकतर मारनेवाले आतंकी 'मुस्लिम' ही क्यों होते है? अब ऐसे में यदि मैंने इस्लाम स्वीकार किया तो आप मुझे कौन-सा मुसलमान बनायेंगे? हर रोज़ जो या तो कभी मस्ज़िद के धमाके में मर जाता, तो कभी ज़रा-सी चूक होने पर पर इस्लामिक कानून के तहत दंड भोगनेवाला या फिर वो मुसलमान जो हर रोज़ बम-धमाके कर मानवता की हत्या कर देता है! इस्लाम के नाम पर मासूमों का खून बहानेवाला या सीरिया की तरह औरतों को अगवाकर बाज़ार में बेचनेवाला! मतलब में मरनेवाला मुसलमान बनूँगा या मारनेवाला ?*

*यह सुनकर दूसरी शंका ने मानो उन विद्वान पर हज़ारों मन बोझ डाल दिया हो। दबी-सी आवाज़ में उन्होंने कहा - बाकी बची आधी शंका भी बोलो?..*
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*सज्जन ने मंद-सी मुस्कान के साथ कहा - वो आधी शंका मेरी धर्मपत्नी जी की है... इनकी शंका 'आधी' इसलिए है कि इस्लाम नारी समाज को पूर्ण दर्जा नहीं देता। हमेशा उसे पुरुष की तुलना में आधी ही समझता है तो इसकी शंका को भी 'आधा' ही आँका जाये !*

*मुस्लिम विद्वान ने कुछ लज्जित से स्वर में कहा - जी मोहतरमा, फरमाइए!...*

*सज्जन की धर्मपत्नी जी ने बड़े सहज भाव से कहा - ये इस्लाम कबूल कर लें, मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं किन्तु मेरी इनके साथ शादी हुए करीब 35 वर्ष हो गये। यदि कल इस्लामिक रवायतों-उसूलों के अनुसार किसी बात पर इन्हें गुस्सा आ गया और मुझे 'तलाक-तलाक-तलाक' कह दिया तो बताइए मैं इस अवस्था में कहाँ जाऊँगी? यदि तलाक भी न दिया और कल इन्हें कोई पसंद आ गयी और ये उससे निकाह करके घर ले आये तो बताइए उस अवस्था में मेरा, मेरे  बच्चों का, मेरे गृहस्थ जीवन का क्या होगा ?
तो ये मेरी 'आधी' शंका है।*

*इस प्रश्न के वार से मुस्लिम विद्वान को निरुत्तर कर दिया। उसने इन जवाबों से बचने के लिए कहा - आप अपना परिचय दे सकते हैं...*
*सज्जन ने कहा - मेरी शंका ही मेरा परिचय है। यदि आपके पास इन प्रश्नों का उत्तर होगा, हमारी 'ढाई शंका' का निवारण आपके पास होगा तो आप मुझे बताना।*

*सज्जन तो वहाँ से चले गये पर मौलाना साहब सिर पकड़कर बैठे रहे। किन्तु इस सारे वार्तालाप से मेरे मन में ज़रूर एक शंका खड़ी हो गयी कि आखिर ये सज्जन कौन हैं...?*

*भारतीय लोग अग्रेषित करे...
*(जैसा प्राप्त हुआ वैसा ही भेजा गया) ।*
अगर कुछ गलत लिखा है तो कृपया सही कर सकते हैं.. 🙏
*pl correct or answer above?🙏

मनुस्मृति की जाँच (भाग−२) :-

राममोहन राय का फर्जी धर्मशास्त्र

(विकिपेडिया हिन्दू−विरोधी संस्था है,पाश्चात्य प्रोफेसरों और उनके भारतीय चेलों को ही प्रामाणिक मानने वाले इस लेख का कुछ अंश प्रस्तुत है,हू−ब−हू हिन्दी अनुवाद मैंने किया है जिसमें अपनी ओर से मैंने जो कुछ भी जोड़ा है वह ब्रैकेट में है । इस लेख में और भी कई रोचक तथ्य हैं,जैसे कि राममोहन राय जब फर्जी धर्मशास्त्र बनवा रहे थे तब घर से यह कहकर लापता थे कि बौद्ध धर्म सीखने के लिये तिब्बत गये हैं किन्तु एक ईसाई मिशनरी से पैसा ऐंठकर फर्जी धर्मशास्त्र बना रहे थे!सती प्रथा पर उनके “योगदान” पर मैं पहले ही प्रकाश डाल चुका हूँ । हमारे पाठ्यपुस्तकों से वे बातें भी छुपायी जाती हैं जो पाश्चात्य प्रोफेसर भी सही मानते हैं!)

https://en.wikipedia.org/wiki/Ram_Mohan_Roy#Christianity_and_the_early_rule_of_the_East_India_Company_(1795%E2%80%931828)
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इस अवधि के दौरान राम मोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी करते हुए एक राजनीतिक आन्दोलनकारी के रूप में काम किया ।

1792 में ब्रिटिश बैपटिस्ट मोची विलियम केरी ने अपनी प्रभावशाली मिशनरी पुस्तक प्रकाशित की :-

“असभ्यों के धर्मान्तरण वाले दायित्वों के निर्वाहन हेतु क्रिस्चियनों द्वारा साधनों का उपयोग” ।
(ईसाई पादरियों के लिये हिन्दुओं की गणना असभ्यों ⁄जंगलियों में  थी ।)

1793 में विलियम केरी भारत में बसने के लिए आये (लार्ड कॉर्नवालिस के गवर्नर जनरल बनते ही)। उनका उद्देश्य था भारतीय भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद, प्रकाशन और वितरण; तथा भारतीयों में ईसाईयत का प्रचार ।  उन्होंने महसूस किया कि "मोबाइल" (यानी सेवा वर्ग =ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौकरी में कार्यरत) ब्राह्मण और पण्डित इस प्रयास में उनकी मदद करने में सबसे अधिक कारगर थे, और विलियम केरी ने उन्हें इकट्ठा करना शुरू कर दिया । विलियम केरी  ने बौद्ध और जैन धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया ताकि सांस्कृतिक सन्दर्भ में ईसाई धर्म के पक्ष में बेहतर तर्क दे सके ।

1795 में केरी ने एक संस्कृत विद्वान तान्त्रिक साई  हरदाना विद्यावागीश से सम्पर्क किया, जिन्होंने बाद में उन्हें राम मोहन राय से मिलवाया जिन्हें अंग्रेज़ी सीखने की इच्छा थी (राम मोहन राय केवल २४ वर्ष के थे ; इनको राजा की उपाधि १८२८ में मुगल बादशाह ने दी किन्तु मुगल बादशाह को तब अधिकार ही नहीं था किसी को राजा बनाने का । ९ वर्ष की अवस्था में ही राममोहन मदरसे भेजे गये पढ़ने के लिये!)।

1796 और 1797 के बीच केरी, विद्यावागीश और रॉय की तिकड़ी ने "महानिर्वाण तन्त्र" ग्रन्थ की रचना की और इसे "एक सच्चे परमेश्वर" का धर्मग्रन्थ घोषित किया (क्योंकि हिन्दुओं के सारे देवी−देवता ‘झूठे’ थे)। कैरी की भागीदारी उनके विस्तृत रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की गई और वह केवल 1796 में संस्कृत सीखने की रिपोर्ट करते हैं (अर्थात् "महानिर्वाण तन्त्र" ग्रन्थ की रचना एक गुप्त षडयन्त्र थी जिस कारण इसके रचना की रिपोर्टिंग नहीं की गयी) और 1797 में एक व्याकरण पूरा किया, उसी वर्ष उन्होंने बाइबिल के कुछ भाग (जोशुआ से जॉब तक) का अनुवाद किया जो एक बड़ा कार्य था । अगले दो दशकों के लिए "महानिर्वाण तन्त्र" नियमित रूप से संवर्धित किया गया । इसके न्याय−सम्बन्धी अध्यायों का उपयोग बंगाल में ब्रिटिश  न्यायालयों में जमीन्दारी के सम्पत्ति विवादों पर निर्णय के लिए हिन्दू कानून के रूप में किया गया ।

(१७९३ में लार्ड कॉर्नवालिस ने भारत की पञ्चायती व्यवस्था को नष्ट करने के लिये “स्थायी बन्दोबस्त” द्वारा ब्रिटिश−भक्त नये जमीन्दार वर्ग को खड़ा करना आरम्भ किया,उसे स्थापित करने के लिये फर्जी हिन्दू धार्मिक कानून की आवश्यकता थी ताकि पञ्चायतों और पुराने भूस्वामियों की जमीनें हड़पकर नये जमीन्दारों को दी जा सके,वरना एक मोची पादरी और उसके दो हिन्दू नौकरों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी क्यों पूछती!तुर्क−पठान और मुगल कालों में लूट−पाट और हत्यायें हुईं किन्तु पुरातन भारतीय सामाजिक व्यवस्था को जीवन्त रखने वाली पञ्चायती व्यवस्था की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने का कार्य राममोहन राय की ईसाई टीम ने ही किया ।)

किन्तु कुछ ब्रिटिश मजिस्ट्रेटों और कलक्टरों को सन्देह होने लगा और इसके उपयोग (साथ ही हिन्दू कानून के स्रोतों के रूप में पण्डितों पर निर्भरता) को शीघ्र ही घटा दिया गया । (क्योंकि यूरोप में संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन जोड़ पकड़ने लगा था जिस कारण भाण्डा फूट गया कि हिन्दू कानून का आधारग्रन्थ  "महानिर्वाण तन्त्र" नहीं बल्कि “मनुस्मृति” है;तब नया कुतर्क यह दिया गया कि विद्यावागीश जैसे पण्डित बेईमान हैं अतः हिन्दू कानून के बारे में किसी भी पण्डित से राय नहीं लेनी चाहिये!केरी महोदय और राममोहन राय पर कोई आरोप नहीं लगा,केवल एक भाड़े के वाममार्गी तान्त्रिक को बलि का बकरा बनाकर सारे पण्डितों को अविश्वसनीय कहा गया ।) विलियम केरी की टीम से विद्यावागीश कुछ समय के लिए हट गए, लेकिन राम मोहन रॉय से विद्यावागीश ने सम्बन्ध बनाए रखा ।

1797 में राम मोहन कलकत्ता पँहुचे और एक "बनिया" (साहूकार) बन गए, जो अपने साधनों से अधिक खर्च करने वाले कम्पनी के (एय्याश) अंग्रेजों को उधार देते थे (दो वर्ष में ही कितना पैसा कमा लिया,“राजा” की उपाधि भी खरीद ली −− बिना किसी राज पाट के!)। राम मोहन ने अंग्रेजी अदालतों में पण्डित के रूप में अपना कार्य जारी रखा और उससे जीवन यापन करने लगे (सारे हिन्दू विवादों में “महानिर्वाण तन्त्र” को धर्मशास्त्रीय प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत करने की फीस वसूलकर । विभिन्न मुकदमों में उस ग्रन्थ में मनमाना फेरबदल करते रहते थे ताकि पैसे वालों के मन मुताबिक “हिन्दू कानून” दिखाकर पैसा कमा सकें ।)। उन्होंने ग्रीक और लैटिन सीखना आरम्भ किया (क्योंकि पादरियों में उन भाषाओं का अधिक महत्व था)। ⋅⋅⋅ ⋅⋅⋅

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