Wednesday, June 19, 2024

भारत में कम्युनिस्ट आतंकवाद (माओवाद)


परिचय

माओवादी आंदोलन, जिसे नक्सलवाद के नाम से भी जाना जाता है, भारत के आंतरिक सुरक्षा के लिए एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है। यह आंदोलन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) द्वारा संचालित होता है और मुख्य रूप से देश के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय है। माओवादी विचारधारा का मुख्य उद्देश्य समाजवाद की स्थापना के लिए सशस्त्र क्रांति के माध्यम से राज्य सत्ता पर कब्जा करना है। इस आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से हुई, जिससे इसे नक्सलवाद का नाम मिला।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत 1967 में चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगाल संथाल जैसे नेताओं ने की थी। यह आंदोलन भूमि सुधार, आदिवासी अधिकार और किसानों की दुर्दशा के खिलाफ था। शुरुआती वर्षों में ही यह आंदोलन व्यापक समर्थन हासिल करने में सफल रहा और पश्चिम बंगाल के अलावा आंध्र प्रदेश, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी फैल गया। समय के साथ, यह आंदोलन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के रूप में संगठित हुआ और इसे चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से-तुंग की विचारधारा से प्रेरणा मिली।

वर्तमान स्थिति

वर्तमान में, माओवादी आंदोलन देश के 90 जिलों में फैला हुआ है, जिसमें से 30 जिले अत्यधिक प्रभावित माने जाते हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्य इस आंदोलन के प्रमुख केंद्र हैं। इन क्षेत्रों में माओवादी संगठनों ने "लाल गलियारा" (Red Corridor) बना रखा है, जो इनके प्रभाव का क्षेत्र माना जाता है।

माओवादी रणनीति और कार्यप्रणाली

माओवादी संगठन गुरिल्ला युद्ध तकनीक अपनाते हैं और ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाते हैं। वे स्थानीय जनता के असंतोष को भुनाते हैं और सरकार की नीतियों के खिलाफ उन्हें संगठित करते हैं। इनके प्रमुख रणनीतियों में शामिल हैं:

1. **सशस्त्र संघर्ष**: माओवादी संगठन स्थानीय सुरक्षा बलों पर हमले करते हैं और हथियार एवं गोला-बारूद लूटते हैं।
2. **विकास परियोजनाओं का विरोध**: माओवादी अक्सर विकास परियोजनाओं, जैसे सड़क निर्माण, खनन और बांध परियोजनाओं का विरोध करते हैं, क्योंकि इनसे स्थानीय आदिवासी और ग्रामीणों के विस्थापन का खतरा होता है।
3. **प्रचार**: वे अपने विचारधारा को फैलाने के लिए प्रचार सामग्री का उपयोग करते हैं और स्थानीय जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं।
4. **छद्म नाम और पहचान**: माओवादी अक्सर छद्म नामों का उपयोग करते हैं और गुप्त ठिकानों से अपनी गतिविधियों को संचालित करते हैं।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

माओवादी आंदोलन का स्थानीय जनजीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को बाधित करता है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सेवाओं पर भी नकारात्मक असर डालता है। इसके कारण कई लोग अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर होते हैं और विस्थापन की समस्या उत्पन्न होती है। माओवादी क्षेत्रों में निवेशकों और विकास परियोजनाओं के प्रति डर का माहौल बना रहता है, जिससे इन क्षेत्रों का विकास प्रभावित होता है।
 सरकारी प्रतिक्रिया

भारत सरकार माओवादी आंदोलन को एक प्रमुख आंतरिक सुरक्षा चुनौती मानती है और इसे नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं:

1. **सुरक्षा बलों की तैनाती**: माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में केंद्रीय और राज्य पुलिस बलों की विशेष तैनाती की जाती है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) और अन्य अर्धसैनिक बलों की मदद से माओवादी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।
2. **विकास योजनाएं**: सरकार ने माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में विकास योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें सड़कों का निर्माण, बिजली और पानी की सुविधाओं का विस्तार और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार शामिल है। इसका उद्देश्य स्थानीय जनता को माओवादियों के प्रभाव से दूर करना है।
3. **समर्पण और पुनर्वास नीति**: माओवादियों के लिए समर्पण और पुनर्वास योजनाएं चलाई जाती हैं, जिनके तहत आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को आर्थिक सहायता, नौकरी और पुनर्वास की सुविधाएं दी जाती हैं।
4. **सामाजिक जागरूकता**: सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं, ताकि स्थानीय जनता को माओवादियों की हिंसक गतिविधियों से दूर रखा जा सके।

चुनौतियां और भविष्य

हालांकि सरकार ने माओवादी आंदोलन पर काबू पाने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से समाप्त करना अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। माओवादी आंदोलन का जड़ें गहरी हैं और इसका समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से संभव नहीं है। इसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें विकास, सामाजिक न्याय, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का समावेश हो।

भविष्य में, अगर सरकार स्थानीय जनता के विश्वास को जीतने में सफल होती है और विकास परियोजनाओं को तेजी से अमल में लाती है, तो माओवादी आंदोलन को नियंत्रित करना संभव हो सकता है। इसके अलावा, माओवादी नेतृत्व और कैडर के बीच संवाद की प्रक्रिया को बढ़ावा देना भी आवश्यक है, ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत में माओवादी आंदोलन एक गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती है, जिसका समाधान कई पहलुओं से निपटना आवश्यक है। सरकार के प्रयासों और स्थानीय जनता की सहभागिता से ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है। इसके लिए एक समग्र और संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें सुरक्षा उपायों के साथ-साथ विकास और सामाजिक न्याय का भी ध्यान रखा जाए।

Tuesday, June 14, 2022

एक साथ 52 क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ पर लटका दिया था

#उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित बावनी इमली एक प्रसिद्ध इमली का पेड़ है, जो भारत में एक शहीद स्मारक भी है। इसी इमली के पेड़ पर 28 अप्रैल 1858 को गौतम क्षत्रिय, जोधा सिंह अटैया और उनके इक्यावन साथी फांसी पर झूले थे। यह स्मारक उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के बिन्दकी उपखण्ड में खजुआ कस्बे के निकट बिन्दकी तहसील मुख्यालय से तीन किलोमीटर पश्चिम में मुगल रोड पर स्थित है।

यह स्मारक स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किये गये बलिदानों का प्रतीक है। 28 अप्रैल 1858 को ब्रिटिश सेना द्वारा बावन स्वतंत्रता सेनानियों को एक इमली के पेड़ पर फाँसी दी गयी थी। ये इमली का पेड़ अभी भी मौजूद है। लोगों का विश्वास है कि उस नरसंहार के बाद उस पेड़ का विकास बन्द हो गया है।

10 मई, 1857 को जब बैरकपुर छावनी में आजादी का शंखनाद किया गया, तो 10 जून,1857 को फतेहपुर में क्रान्तिवीरों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिया जिनका नेतृत्व कर रहे थे जोधासिंह अटैया। फतेहपुर के डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खाँ भी इनके सहयोगी थे। इन वीरों ने सबसे पहले फतेहपुर कचहरी एवं कोषागार को अपने कब्जे में ले लिया। जोधासिंह अटैया के मन में स्वतन्त्रता की आग बहुत समय से लगी थी। उनका सम्बन्ध तात्या टोपे से बना हुआ था। मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए इन दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से पांडु नदी के तट पर टक्कर ली। आमने-सामने के संग्राम के बाद अंग्रेजी सेना मैदान छोड़कर भाग गयी ! इन वीरों ने कानपुर में अपना झंडा गाड़ दिया।

जोधासिंह के मन की ज्वाला इतने पर भी शान्त नहीं हुई। उन्होंने 27 अक्तूबर, 1857 को महमूदपुर गाँव में एक अंग्रेज दरोगा और सिपाही को उस समय जलाकर मार दिया, जब वे एक घर में ठहरे हुए थे। सात दिसम्बर, 1857 को इन्होंने गंगापार रानीपुर पुलिस चैकी पर हमला कर अंग्रेजों के एक पिट्ठू का वध कर दिया। जोधासिंह ने अवध एवं बुन्देलखंड के क्रान्तिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया।

आवागमन की सुविधा को देखते हुए क्रान्तिकारियों ने खजुहा को अपना केन्द्र बनाया। किसी देशद्रोही मुखबिर की सूचना पर प्रयाग से कानपुर जा रहे कर्नल पावेल ने इस स्थान पर एकत्रित क्रान्ति सेना पर हमला कर दिया। कर्नल पावेल उनके इस गढ़ को तोड़ना चाहता था, परन्तु जोधासिंह की योजना अचूक थी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का सहारा लिया, जिससे कर्नल पावेल मारा गया। अब अंग्रेजों ने कर्नल नील के नेतृत्व में सेना की नयी खेप भेज दी। इससे क्रान्तिकारियों को भारी हानि उठानी पड़ी। लेकिन इसके बाद भी जोधासिंह का मनोबल कम नहीं हुआ। उन्होंने नये सिरे से सेना के संगठन, शस्त्र संग्रह और धन एकत्रीकरण की योजना बनायी। इसके लिए उन्होंने छद्म वेष में प्रवास प्रारम्भ कर दिया, पर देश का यह दुर्भाग्य रहा कि वीरों के साथ-साथ यहाँ देशद्रोही भी पनपते रहे हैं। जब जोधासिंह अटैया अरगल नरेश से संघर्ष हेतु विचार-विमर्श कर खजुहा लौट रहे थे, तो किसी मुखबिर की सूचना पर ग्राम घोरहा के पास अंग्रेजों की घुड़सवार सेना ने उन्हें घेर लिया। थोड़ी देर के संघर्ष के बाद ही जोधासिंह अपने 51 क्रान्तिकारी साथियों के साथ बन्दी बना लिये गये।

28 अप्रैल, 1858 को मुगल रोड पर स्थित इमली के पेड़ पर उन्हें अपने 51 साथियों के साथ फाँसी दे दी गयी। लेकिन अंग्रेजो की बर्बरता यहीं नहीं रुकी । अंग्रेजों ने सभी जगह मुनादी करा दिया कि जो कोई भी शव को पेड़ से उतारेगा उसे भी उस पेड़ से लटका दिया जाएगा । जिसके बाद कितने दिनों तक शव पेड़ों से लटकते रहे और चील गिद्ध खाते रहे । अंततः महाराजा भवानी सिंह अपने साथियों के साथ 4 जून को जाकर शवों को पेड़ से नीचे उतारा और अंतिम संस्कार किया गया । बिन्दकी और खजुहा के बीच स्थित वह इमली का पेड़ (बावनी इमली) आज शहीद स्मारक के रूप में स्मरण किया जाता है।

Thursday, May 26, 2022

संत कनप्पा कि भक्ति

संत कनप्पा उन 63 नयनार संतों में गिने जाते हैं, जो शिव के उपासक थे, व तीसरी से आठवीं शताब्दी के बीच हुए थे। जबकि अलवार संत विष्णु के उपासक थे। कनप्पा पेशे से शिकारी थे, जो बाद में संत बन गए। उनके भक्त मानते हैं कि वो पिछले जन्म में पांडवों में से एक अर्जुन थे। कनप्पा नयनार के कई नाम चलन में हैं, जैसे थिनप्पन, थिन्नन, धीरा, कन्यन, कन्नन आदि। माता पिता ने उनका नाम थिन्ना रखा था। आंध्र प्रदेश के राजमपेट इलाके में उनका जन्म हुआ था।
उनके पिता बड़े शिकारी थे और शिवभक्त थे, शिव के पुत्र कार्तिकेय को पूजते थे। कनप्पा श्रीकलहस्तीश्वरा मंदिर में वायु लिंग की पूजा करते थे, शिकार के दौरान उन्हें ये मंदिर मिला था। पांचवी सदी में बना इस मंदिर का बाहरी हिस्सा 11वीं सदी में राजेन्द्र चोल ने बनवाया था, बाद में विजय नगर साम्राज्य के राजाओं ने उसका जीर्णोद्धार करवाया।
लेकिन थिन्ना को पता नहीं था कि शिव भक्ति और पूजा के विधि विधान क्या है। किन नियमों का पालन करना है, लेकिन उनकी श्रद्धा अगाध थी। कहा ये तक जाता है कि वह पास की स्वर्णमुखी नदी से मुंह में पानी भरकर लाते थे और उससे शिवलिंग का जलाभिषेक करते थे, चूंकि शिकारी थे, सो जो भी उन्हें मिलता था, एक हिस्सा शिव को अर्पित कर देते थे, यहां तक कि एक बार सुअर का मांस भी।
लेकिन शिव अपने इस भक्त की आस्था को देखकर खुश थे, उनको पता था कि इसे पूजा करनी नहीं आती है, ना मंत्र पता हैं ना किसी तरह के विधि विधान। सैकड़ों सालों से ये कथा कनप्पा के भक्तों में प्रचलित है कि एक दिन महादेव ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी और उन्होंने उस मंदिर में उस वक्त भूकंप के झटके दिए, जब मंदिर में बाकी साथियों, भक्तों और पुजारियों के साथ कनप्पा भी मौजूद थे।
जैसे ही भूकंप के झटके आए, लगा कि मानो मंदिर की छत गिरने वाली है, तो डर के मारे सभी भाग गए, भागे नहीं तो बस कनप्पा। उन्होंने ये किया कि अपने शरीर से शिव लिंग को पूरी तरह से ढक लिया ताकि कोई पत्थर अगर गिरे तो शिवलिंग के ऊपर ना गिरे बल्कि उनके ऊपर गिरे। इससे वह पूरी तरह सुरक्षित रहा।
शिवलिंग पर तीन आंखें बनी हुई थीं। जैसे ही भूकम्प के झटके थोड़ा थमे, कनप्पा ने देखा कि शिवलिंग पर बनी एक आंख से रक्त और आंसू एक साथ निकल रहे थे। उनकी समझ में आ गया कि किसी पत्थर से शिवजी की एक आंख घायल हो गई है। आव देखा ना ताव, कनप्पा ने फौरन अपनी एक आंख अपने एक वाण से निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी और उसे निकालकर शिवलिंग की आंख पर लगा दिया, जिससे उसमें से खून निकलना बंद हो गया। लेकिन थोड़ी देर बाद ही शिवलिंग की दूसरी आंख से रक्त और आंसुओं का निकलना शुरू हो गया।
तब कनप्पा ने जैसे ही दूसरी आंख निकालने की प्रक्रिया शुरू की, उनके दिमाग में आया कि जब मैं अपनी दूसरी आंख भी निकाल लूंगा तो बिलकुल अंधा हो जा जाऊंगा, ऐसे में मुझे कैसे दिखेगा कि उस आंख को शिवलिंग में कैसे लगाना है।
ऐसे में उन्हें एक उपाय सूझा, उन्होंने फौरन अपना एक पैर उठाया और पैर का अंगूठा ठीक उस आंख के पास लगा दिया, ताकि अंधा होने के बावजूद वो शिवजी की दूसरी आंख की जगह अपनी आंख लगा सके। उसी वक्त भगवान शिव प्रकट हुए और उससे खुश होकर उसकी आंखें एकदम ठीक कर दीं। यही वो घटना थी, जिसके चलते थिन्ना को नया नाम कनप्पा मिला था।
इसी मौके की वो तस्वीर या मूर्तियां हैं, कि कैसे वह एक हाथ में वाण से आंख निकालेंगे, दूसरे हाथ से उसे पकड़ेंगे तो जहां से आंख निकालनी है, उस जगह को कैसे चिन्हित करेंगे, तो पैर का अंगूठा उस मासूम भक्त ने शिवलिंग पर रखा, इस काम के लिए था। लेकिन जितने भी लोग शेयर करे रहे हैं, चाहे वो देवदत्त पटनायक ही क्यों ना हो, किसी को ये नहीं बता रहे कि शिव भगवान ने उनकी भक्ति की परीक्षा ली थी और ये बस एक पल का वाकया था, ना कि रोज कनप्पा ऐसा किया करते थे. लेकिन इससे सच्चाई बाहर आ जाती और उनमें से बहुत से लोग ये चाहते भी नहीं।
- विष्णु शर्मा

Thursday, April 14, 2022

भारत एक झूठ पे जी रहा है की, India एक आज़ाद देश है!🤣

मेरी हिन्दी बहुत खराब है! क्योंकि में अवधी हु! और अनपड़ भी!
मे अपने विचार साझा करना चाहता हु! 

भारत 2022
भारत की अच्छाई व बुराई दोनों केहना चाहता हु!

अच्छाई
# भारत कि आबादी (विकाश व ताकतवर) बनने में सछम।
# भारत का खनिज
# भारत की विविधता (जिसमे ज्ञान व अज्ञान, नास्तिकता व आस्तिकता)

बुराई

Sunday, April 3, 2022

चंदा 2022



जय  हो माई
जय  हो माई


*।।जय चउरा माता।।🚩*
*【तीसरा दौर अप्रैल 2022】*
(बघेड़ी) update: 03 April 2022

श्री धीरज मिश्र   >> *2200+2100₹..+2100₹...=6400₹*
श्री शरदा प्रसाद मिश्र >> *500₹+ 6001₹..+2100₹...= 8601₹*
श्री माता प्रसाद मिश्र >> *500₹+ 3200₹..+2100₹...=5800₹*
श्री राम प्रसाद मिश्र >> *100₹*
श्री संजय मिश्र >>  *600₹*
श्री लोलारखनाथ यादव >> *501₹+ 1002₹..= 1503*
श्री सुभम सिंह >> *500₹+501₹= 1001₹*
राजकुमार यादव >> *21₹*
श्री संतोष कुमार मिश्र >> *501₹ + 501₹..=1002₹*
श्री सर्वेश मिश्र >> *501₹*
श्री शैलेश मिश्र >> *501₹+ 1011₹..+1000₹...=2512₹*
श्री पवन कुमार मिश्र >> *1002₹+2100₹...=3102₹*
श्री काशीनाथ यादव >> *501₹+1100₹..= 1601₹*
श्री कमलेश मिश्र >> *551₹*
श्री बाल जी मिश्र >> *501₹+1100₹..= 1601₹*
श्री लोकमनी सिंह >> *511₹+2551₹=3062₹*
श्री रमेश सिंह >> *501₹*
श्री गंगा प्रसाद मिश्र >> *500₹*
श्री धनराज यादव >> *1001₹ + 500₹*
श्री शेर बहादुर सिंग >> *101₹+501₹..=602₹*
श्री सुजीत मोरया (मड़वा) >> *50₹*
श्री हरिकेश मिश्र >> *511₹*
श्री महेंद्र प्रताप सिंग >> *501₹*
श्री दिनेश मिश्र (मास्टर) >> *2100₹+3100₹..5200₹*
श्री अभयराज यादव >> *300₹*
श्री गोपाल मिश्र >> *200₹+1001₹..+501₹...= 1702₹*
श्री राज बाहदुर यादव >> *2151₹ + 3111₹..=5263₹*
श्री राममोहन मिश्र >> *2111₹*
श्री प्रिंस मिश्र >> *501₹ + 501₹..=1002*
श्री दिनेश मिश्र >> *1100₹+501₹..=1601₹*
श्री प्रीतम सिंग >> *501₹..*
श्री शिलाजीत मिश्र >>*501₹..*
अंशू मिश्र >> *101₹..*
श्री कृष्णा मिश्र >> *2100₹..*
श्री भगवानदीन यादव >> *501₹*
श्री संतोसी यादव >> *101₹*
श्री अजय मिश्र >> *501₹..*
श्री महेश मिश्र >> *501₹...*
श्री राजेश मिश्र >> *1100₹...*
श्री राजेश मिश्र (लाल)>> *1500₹...*
श्री गौरीशंकर >> *500₹...*
श्री भानुप्रताप सिंग >> *11000₹...*
@77709₹


+
जन्मास्टमी का चंदा +950₹

अभी तक की जमा राशी = 78660₹ (3 April)


2021- की खर्च राशी = 16567₹

_____________________

6 Sept 2021

# 6 इंच का पाइप 24फुट = 2350₹ + 50₹ रिक्शा चार्ज= 2400₹
# आधी टाली मीडियम बालू = 1750₹
# अल्ट्राटेक सीमेंट (३ बोरी) =1095₹ 
# 6 पीस सरिया 44kg = 2332₹
# लेबर 100₹ टेम्पो 250₹ =350₹
# आधी टाली मोटी बालू = 3400₹ (मोरया मड़वा)
# मजदूरों का खर्च अभी तक (1150₹)
*25 तरीक से काम सुरु*
# 3 बोरी सीमेंट 980₹
# 2 दीन की मजदूरी 1800₹
# 4 फिट पाइप ४" और L पाइप ४" 270₹
# 3 टाली मिट्टी @180₹ × 3 = 540₹
# पेंट + w सीमेंट 150₹, plastic त्रिपाल 150₹ आदि.. = लगभग 500₹

Total = 16567₹
कुल समान व मजदूर की लागत!

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3 अप्रैल 2022

✅150₹ 12 hook
✅1500₹ दिनु और मज़दूर 2 दिन का
✅7050₹  तार, 50kg sariya, 10 बोरी cement।
✅600₹ लाइटिंग पाइप एंड other
✅1400₹ लिंटर के दिन का खर्च 
✅ 5780₹ 14kg सरिया और बालू
✅300 स्टील तार , 2 कन्नी , मटकी आदि
✅ 700₹ खर्चा मजदूरी(500 नान्हू)
✅ 2300₹ (24 feb से 14 मार्च तक 40 balli और 350 पट्टी)
✅*11000₹ (मार्बल@36₹ ग्रेनाइट@125₹ 10750 + Addtional charge)
✅*200 (बसूली और टाइल्स कटर)
✅मार्बल फ्रॉम बदशपुर to बहेड़ी (800₹)
✅1550₹ 4 bori cement
✅**** एक्स्ट्रा खर्च
✅ *1500₹ मज़दूरी
✅ 2551₹ 500 ईंट
@*टोटल:* *लगभग 37521₹ (37500₹)20 मार्च तक

470₹ 15kg white cement (पोताई व टाइल्स के लिए)
365₹ ```180 gram``` Aerolite
14500₹ रेलिंग (भाड़ा आदि)
6000₹ टाइल्स ( भाड़ा व टूल सहित )
600₹ मजदूरी (2 दिन छोटे)
*1400₹ (4 टाइल्स rubbing व 3 cutting किट)
1500₹ (4 बोरी सीमेंट *370₹)
1500₹ (पेंट व stikers व ब्रश)
*1400₹ (700 मुकोठा व 700 घंटी व चैन)
@27735₹

16567+36380+27735+210
=80892₹ (81000₹)

*जय चउरा माई🚩*

🪔🪔🪔🪔

Saturday, February 26, 2022

मैं सांड़ हूं

जरा मेरी भी सुनो
मैं सांड़ हूं , लोग कहते हैं कि मैं तुम्हारी फसल उजाड़ रहा हूँ , सड़कों पर कब्जा कर रहा हूँ ,मैं तुम मनुष्यों से पूंछता हूँ कि कितने कम समय में मैं इतना अराजक हो गया,मे तो हजारो वर्षो से तुम्हारे पूर्वजों की सेवा करता आया हू ! मैं मनुष्यों का दुश्मन कैसे बन गया ।
अभी कुछ सालों पहले तो लोग मुझे पालते थे ,चारा देते थे , लेकिन मनुष्य ज्यादा सभ्य हो गया ट्रैक्टर ले आया ,पम्पिंग सेट से पानी निकालने लगा और मुझे खुला छोड़ दिया , मैं कहाँ जाता ? कहाँ चरता ? मनुष्य ने चरागाहों पर कब्जा कर लिया , अब पापी पेट का सवाल है  अपने पेट के लिए अपने मित्र मनुष्य से संघर्ष शुरू हो गया। मैं तो दुनिया में आना भी नहीं चाहता किंतु तुम मनुष्यों के लिए दूध की आवश्यकता है, तुम्हारे बच्चों के पोषण के लिए मेरा आना निहायत जरूरी है।
यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना पेट भरने के लिए मुझे काटना भी शुरू कर दिया ,मैं फिर भी चुप रहा ,चलो किसी काम तो आया तुम्हारे।मेरी माँ ने मेरे हिस्से का दूध देकर तुम्हे और तुम्हारे बच्चों को पाला लेकिन अब तो तुमने उसे भी खुला छोड़ दिया ।
इधर पिछले सालों से कई मनुष्य मित्रों ने मुझे कटने से बचाने के लिए अभियान चलाया , लेकिन जब मैं अपना पेट भरने खातिर उनकी फसल खा गया तो वही मित्र मुझे बर्बादी का कारण बताने लगे , शायद अब यही चाहते हैं कि मैं काट ही दिया जाता ।
मित्रों बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारी जीवन भर सेवा करूंगा तुम्हारे घर के सामने बंधा रहूँगा।‌ थोड़े से चारे के बदले तुम्हारे खेत जोत दूंगा । रहट से पानी निकाल दूंगा , गाड़ी से सामान ढो दूंगा। बस मुझे अपना लो 
लेकिन क्या मेरे इस निवेदन का तुम पर कोई असर होगा ?
अरे तुम लोग तो अपने लाचार मां बाप को भी घर से बाहर निकाल देते हो , फिर मेरी क्या औकात..??

जय गौ वंश।

Tuesday, February 22, 2022

हम अपनी स्वतंत्रता का मूल्य अपने रक्त से चुकाएंगे

यह #घटना उस समय की है जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विदेश जाकर देश को आजाद कराने के लिए आजाद हिंद फौज के गठन का कार्य प्रारंभ किया।
उसी दौरान उन्होंने रेडियो प्रसारण पर एक आह्वान किया था कि "हम अपनी स्वतंत्रता का मूल्य अपने रक्त से चुकाएंगे"
उस समय वे बर्मा मे थे।

आजाद हिंद फौज के गठन व युवाओं को भरती करने के लिए उन्होंने अपना एक कमांडर भारत में नियुक्त किया.. कैप्टन ढिल्लों।
कैप्टन को विशेष निर्देश दिए कि ऐसे युवक को फौज में भर्ती न किया जाए जो अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र हो। उपयुक्त नियम का सख्ती से पालन करना है...

उस दिन कैप्टन ढिल्लों भर्ती होने के लिए सैकड़ों युवक जो पंक्ति मे खड़े थे उनका शारीरिक नापजोख करते थे और उनसे अंत में एक प्रश्न पूछते थे कि क्या आप अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र हो?
उपयुक्त उत्तर मिलने पर भर्ती कर लिया जाता था उस दिन उन्होंने अन्य युवकों की भांति एक युवक की छाती को मापकर तोल लेने वाली मशीन पर उसका वजन लिया, सब कुछ ठीक-ठाक पाया,  वह युवक फौज में ले लिए जाने की आशा से मुस्कुरा रहा था अंत में कैप्टन ढिल्लो ने उससे पूछा..

तुम्हारे ओर कितने भाई हैं?

उस नौजवान ने कहा " मैं तो अकेला हूं, मेरे पिता भी इस समय जीवित नहीं है घर में सिर्फ मेरी मां है"

"क्या करते हो तुम" कैप्टन ढिल्लों ने पूछा..
"मैं गाय भैंस पालता हूं खेती भी करता हूं"
"हिंदुस्तान में कहां के रहने वाले हो" ?
"पंजाब(आज का हरियाणा) से हूँ"

तुम्हारा नाम?
"अर्जुन सिंह"
कैप्टन ढिल्लो ने कुछ उदास होकर कहा..
अर्जुन सिंह मुझे अफसोस है कि तुम्हें फौज में नहीं लिया जा सकता मुझे तुम्हारी देशभक्ति पर कोई संदेह नहीं है लेकिन तुम अपनी मां के अकेले बेटे हो, जाओ अपना खेत और अपने पशुओं को संभालो मां की सेवा करो अर्जुन की खुशी उदासी में बदल गई...
वह घर लौटा तो मां ने पूछा क्यों अर्जुन तुम तो आजाद हिंद सेना  में गए थे भर्ती होने इतनी जल्दी आ गए क्या?
अर्जुन सिंह ने अपनी बूढ़ी मां को सब कुछ बता दिया..
सुनकर मां शांत होकर बोली घबराओ मत बेटे एक-दो दिन बाद फौज में तुम जरूर जाना तुम ले लिए जाओगे तुम देश के सच्चे सपूत बनकर दिखाओ, दिल को छोटा मत करो।

तीसरे दिन पुनः अर्जुन सिंह फौज में भर्ती होने वाले युवकों की पंक्ति में खड़ा था... सामने से आते ही कैप्टन ढिल्लों ने उसे पहचान लिया और बोला कि तुम फिर आ गए तुम्हें याद नहीं है... मैंने तुम्हें क्या कहा था,,
अर्जुन सिंह ने  भरे हुए गले से कहा..
"कैप्टन साहब मुझे आपकी बात खूब याद है किंतु मेरी बूढ़ी मां ने कुएं में कूदकर अपनी जान ही दे दी, कुएं में कूदने के पहली रात को उसने मुझसे कहा था कि यह मेरे लिए बड़ी लज्जा की बात है कि मेरे कारण से तुम आजाद हिंद सेना में नहीं लिए जा सके नेताजी का सहयोगी बनकर देश के काम नहीं आ सके"...
इतना सुनते ही कैप्टन ढिल्लो की आंखों में आंसू भर गए उन्होंने उसी समय अर्जुन को भर्ती कर लिया और 2 दिन बाद जब सुभाष बाबू निरीक्षण के लिए आए तो कैप्टन ने अर्जुन को नेताजी से मिलवाया।
अर्जुन सिंह को देखकर नेता जी ने कहा की अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए हमें यह जीवन अंतिम सांस तक दुश्मन से लड़ते हुए मोर्चे पर बिताना है इसमें यदि हमारी मृत्यु भी होती है तो भी पीछे नहीं हटना है...
अर्जुन सिंह ने नेताजी को वचन दिया और अपना वादा निभाया मोर्चे पर वह तब तक लड़ता रहा जब तक कि उसकी राइफल में एक भी गोली बाकी थी..
अर्जुन सिंह के शहीद होने का समाचार  नेताजी सुभाष को जब मिला तो वे स्वयं गये जहां अर्जुन सिंह की मे स्मृति में एक छोटा सा स्मारक उन्होंने बनवाया और उस पर उन्होंने लिखा था "मृत्यु से खेलने वाले इन मां और पुत्र दोनों को मेरा प्रणाम"....

ऐसे ऐसे महान रत्नों को खोकर मिली आजादी का श्रेय कुछ  स्वार्थी लोगो ने  गांधी की झूठी अहिंसा को दे दिया...
जिन नेताजी ने गांधी का सम्मान करते हुए उन्हें "राष्ट्रपिता" कह दिया था उस गांधी ने ही हस्ताक्षर कर नेहरू व जिन्ना दोनों की मनोकामना पूरी कर भारत को टुकड़े टुकड़े कर दिया।

Saturday, August 14, 2021

शांति और अहिंसा


*शांति और अहिंसा के सबसे बड़े नाम गौतम बुद्ध* ...और उनकी मूर्ति के पास हथियार सहित बैठा कोई तालिबानी .!!

*यही सत्य है, अहिंसा का उपदेश केवल सभ्य समाज के लिये है, कट्टरपंथी सोच की किसी भी समाज को शांति व अहिंसा का उपदेश देने की कोशिश करेंगे तो आपके बच्चों को इसका हिसाब अपने कटे सिरों से गिरते खून से, और आपकी बेटियों को भेडियों द्वारा अपने शरीर को नोंचे जाने से देना पड़ेगा .!!*

*अपने बच्चों को गौतम बुद्ध की तरह शांति व अहिंसा का उपदेश मत दीजिये, गांधी बाबा की तरह एक थप्पड़ मारे जाने पर दूसरा गाल आगे करने को मत कहिए .....*
*प्रभु श्रीराम की तरह धनुष बाण उठाने, श्रीकृष्ण की तरह परम संहारक चक्र उठाने, देवों के देव महादेव शिव जी की तरह अपनी तीसरी आंख खोलने की शिक्षा दीजिए .!!*
*उसके साथ ही यह अवश्य बताइए कि शेर भी अकेला हो तो उसे जंगली कुत्ते घेरकर मार डालते हैं, इसलिये सभी हिन्दुओं को आपस में संगठित अवश्य होना होगा .!!*

*पिछले 650-700 वर्ष का इतिहास हमें यही बताता है कि हमारे अनेकों वीर हिन्दू राजाओं ने लाखों करोड़ों वीर सैनिकों के साथ अपने-अपने राज्य की रक्षा के लिये अपने जीवन का बलिदान किया......*
*लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा लगभग न के बराबर हुआ कि सभी राजा एक साथ मिलकर अरब से आये खूंखार लुटेरों से लड़ते. इसी कारण एक लम्बे समय तक विदेशी आक्रांता हमारे देश पर राज करते रहे, हमें लूटते रहे .!!*

*हिन्दू हो, तो आपस में मिल जुलकर रहिए और अपने हिन्दू भाइयों की छोटी मोटी गलतियों को नजरअंदाज करना सीखिए ......*
*और राजनैतिक रूप से संगठित होने के लिये भाजपा के बड़े नेताओं पर विश्वास कीजिए, अगले यूपी चुनाव में भाजपा को वोट दीजिए .!!*

  *जय हिंद*
*वन्दे मातरम्*

🙏🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🙏

Friday, August 13, 2021

ग्राम बघेड़ी जंघई प्रयागराज।



जय  हो माई
*बारिश के कारन काम धीमा चल रहा है!

*।।जय चउरा माता।।🚩*
*【दूसरा दौर मई 2021】*
(बघेड़ी) update: 06 September 2021 

श्री धीरज मिश्र   >> *1100₹ +1100₹= 2200*
श्री शरदा प्रसाद मिश्र >> *500₹*
श्री माता प्रसाद मिश्र >> *500₹*
श्री राम प्रसाद मिश्र >> *100₹*
श्री संजय मिश्र >>  *600₹*
श्री लोलारखनाथ यादव >> *501₹*
श्री सुभम सिंह >> *500₹*
राजकुमार यादव >> *21₹*
श्री संतोष कुमार मिश्र >> *501₹*
श्री सर्वेश मिश्र >> *501₹*
श्री शैलेश मिश्र >> *501₹*
श्री पवन कुमार मिश्र >> *501₹ + 501₹ =1002₹*
श्री काशीनाथ यादव >> *501₹*
श्री कमलेश मिश्र >> *551₹*
श्री बाल जी मिश्र >> *501₹*
श्री लोकमनी सिंह >> *511₹*
श्री रमेश सिंह >> *501₹*
श्री गंगा प्रसाद मिश्र >> *500₹*
श्री धनराज यादव >> *1001₹*
श्री शेर बहादुर सिंह >> *101₹*
श्री सुजीत मोरया (मड़वा) >> *50₹*
श्री हरिकेश मिश्र >> *511₹*
श्री महेंद्र प्रताप सिंह >> *501₹*
श्री दिनेश मिश्र (मास्टर) >> *2100₹*
श्री अभयराज यादव >> *300₹*
श्री गोपाल मिश्र >> *200₹*
श्री राज बाहदुर यादव >> *2151₹*
श्री राममोहन मिश्र >> *2111₹*
श्री प्रिंस मिश्र >> *501₹*
श्री दिनेश मिश्र >> *1100₹*

जन्मास्टमी का चंदा +950₹

अभी तक की जमा राशी = 22069₹


अभी तक की खर्च राशी = 16567₹

_____________________

6 Sept 2021

# 6 इंच का पाइप 24फुट = 2350₹ + 50₹ रिक्शा चार्ज= 2400₹
# आधी टाली मीडियम बालू = 1750₹
# अल्ट्राटेक सीमेंट (३ बोरी) =1095₹ 
# 6 पीस सरिया 44kg = 2332₹
# लेबर 100₹ टेम्पो 250₹ =350₹
# आधी टाली मोटी बालू = 3400₹ (मोरया मड़वा)
# मजदूरों का खर्च अभी तक (1150₹)
*25 तरीक से काम सुरु*
# 3 बोरी सीमेंट 980₹
# 2 दीन की मजदूरी 1800₹
# 4 फिट पाइप ४" और L पाइप ४" 270₹
# 3 टाली मिट्टी @180₹ × 3 = 540₹
# पेंट + w सीमेंट 150₹, plastic त्रिपाल 150₹ आदि.. = लगभग 500₹

Total = 16567₹
कुल समान व मजदूर की लागत!

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3 अप्रैल 2022

✅150₹ 12 hook
✅1500₹ दिनु और मज़दूर 2 दिन का
✅7050₹  तार, 50kg sariya, 10 बोरी cement।
✅600₹ लाइटिंग पाइप एंड other
✅1400₹ लिंटर के दिन का खर्च 
✅ 5780₹ 14kg सरिया और बालू
✅300 स्टील तार , 2 कन्नी , मटकी आदि
✅ 700₹ खर्चा मजदूरी(500 नान्हू)
✅ 2300₹ (24 feb से 14 मार्च तक 40 balli और 350 पट्टी)
✅*11000₹ (मार्बल@36₹ ग्रेनाइट@125₹ 10750 + Addtional charge)
✅*200 (बसूली और टाइल्स कटर)
✅मार्बल फ्रॉम बदशपुर to बहेड़ी (800₹)
✅1550₹ 4 bori cement
✅**** एक्स्ट्रा खर्च
✅ *1500₹ मज़दूरी
✅ 1530₹ 300 ईंट
@*टोटल:* *लगभग 36380₹ (36500₹)20 मार्च तक

470₹ 15kg white cement (पोताई व टाइल्स के लिए)
365₹ ```180 gram``` Aerolite
14500₹ रेलिंग (भाड़ा आदि)
6000₹ टाइल्स ( भाड़ा व टूल सहित )
600₹ मजदूरी (2 दिन छोटे)
*1400₹ (4 टाइल्स rubbing व 3 cutting किट)
1500₹ (4 बोरी सीमेंट *370₹)
1500₹ (पेंट व stikers व ब्रश)
*1400₹ (700 मुकोठा व 700 घंटी व चैन)
2551₹ (500 इट)
@30286₹

16567+36380+30286
=83353₹




Friday, July 30, 2021

दलितों तो पूरे विस्व में है! पर भारत के दलित सब से सूखी है?

अंबेडकर को लेकर बहुत से मिथक हैं जिन्हें सच माना जाता है। कल एंड टीवी पर शुरू होने वाले अंबेडकर पर आधारित शो का टीज़र मित्र ने भेजा।  कल उस मित्र से इस संदर्भ में बात हो रही थी तो सोचा क्यों न उन मिथकों और उनकी सच्चाई पर एक सार्वजनिक पोस्ट की जाए। आइए जानते हैं क्या हैं वो मिथक और क्या है सच्चाई-

●मिथक- अंबेडकर बहुत मेधावी थे।

सच्चाई- अंबेडकर ने अपनी सारी शैक्षणिक डिग्रियाँ तीसरी श्रेणी में पास की।

●मिथक- अंबेडकर बहुत गरीब थे।

सच्चाई- जिस ज़माने में लोग फोटो तक नहीं खींचा पाते थे उस ज़माने में अंबेडकर की बचपन की बहुत सी फोटो हैं वह भी कोट पैंट में!

●मिथक- अंबेडकर ने शूद्रों को पढ़ने का अधिकार दिया।

सच्चाई- अंबेडकर के पिता जी ख़ुद उस ज़माने में आर्मी में सूबेदार मेजर थे जो यह बताता है कि उस समय पढ़ने का अधिकार शूद्रों के पास था।

●मिथक- अंबेडकर को पढ़ने नहीं दिया गया।

सच्चाई- उस ज़माने में अंबेडकर को गुजरात वडोदरा के क्षत्रिय राजा सीयाजी गायकवाड़ ने स्कॉलरशिप दी और विदेश पढ़ने तक भेजा और ब्राह्मण गुरु जी ने अपना नाम अंबेडकर भी दिया।

●मिथक- अंबेडकर ने नारियों को पढ़ने का अधिकार दिया।

सच्चाई- अंबेडकर के समय ही 20 पढ़ी लिखी औरतों ने संविधान लिखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया!

●मिथक- अंबेडकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।

सच्चाई- अंबेडकर ने सदैव अंग्रेजों का साथ दिया।भारत छोड़ो आंदोलन की जम कर खिलाफत की। अंग्रेजों को पत्र लिखकर बोला कि आप और दिन तक देश में राज करिए। उन्होंने जीवन भर हर जगह आजादी की लड़ाई का विरोध किया।

●मिथक- अम्बेडकर बड़े शक्तिशाली थे।

सच्चाई- 1946 के चुनाव में पूरे भारत भर में अंबेडकर की पार्टी की जमानत जप्त हुई थी।

●मिथक- अंबेडकर ने अकेले आरक्षण दिया।

सच्चाई- आरक्षण संविधान सभा ने दिया जिसमें कुल 389 लोग थे।अंबेडकर का उसमें सिर्फ एक वोट था। आरक्षण सब के वोट से दिया गया था।

●मिथक- अंबेडकर राष्ट्रवादी थे।

सच्चाई- 1931 में गोलमेज सम्मेलन में गाँधी जी के भारत के टुकड़े करने की बात कर दलितों के लिए अलग दलितस्तान की माँग अंबेडकर ने की थी।

●मिथक- अंबेडकर ने भारत का संविधान लिखा।

सच्चाई- जो संविधान अंग्रेजों के 1935 के मैग्नाकार्टा से लिया गया हो और विश्व के 12 देशों से चुराया गया है। उसे आप मौलिक संविधान कैसे कह सकते हैं? अभी भी सोसायटी एक्ट में 1860 लिखा जाता है।

●मिथक- आरक्षण को लेकर संविधान सभा के सभी सदस्य सहमत थे।

सच्चाई- इसी आरक्षण को लेकर सरदार पटेल से अंबेडकर की कहा सुनी हो गई थी। पटेल संविधान सभा की मीटिंग छोड़कर बाहर चले गये थे, बाद में नेहरू के कहने पर पटेल वापस आये थे।

सरदार पटेल ने कहा कि जिस भारत को अखण्ड भारत बनाने के लिए भारतीय देशी राजाओं, महराजाओं, रियासतदारों, तालुकेदारों ने अपनी 546 रियासतों को भारत में विलय कर दिया जिसमें 513 रियासतें क्षत्रिय राजाओं की थी। इस आरक्षण के विष से भारत भविष्य में खण्डित होने के कगार पर पहुँच जाएगा और आज हम वैसा होते देख भी रहे हैं।

●मिथक- अंबेडकर स्वेदशी विचारधारा के थे।

सच्चाई- देश के सभी नेताओं का तत्कालीन पहनावा भारतीय पोशाक धोती -कुर्ता, पैजामा-कुर्ता, सदरी व टोपी,पगड़ी, साफा, आदि हुआ करता था। गाँधी जी ने विदेशी पहनावा व वस्तुओं की होली जलवाई थी। यद्यपि नेहरू, गाँधी व अन्य नेता विदेशी विश्वविद्यालय व विदेशों में रहे भी थे फिर भी स्वदेशी आंदोलन से जुड़े रहे। वहीं अंबेडकर की कोई भी तस्वीर भारतीय पहनावे में देखने को नहीं मिलती है। अंबेडकर अंग्रेजियत के हिमायती थे।

नोट- मेरा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाना नहीं है बल्कि सच्चाई बयां करने की कोशिश करना है।तथ्यों की जानकारी आप स्वयं भी प्राप्त कर सकते हैं।

Saturday, July 24, 2021

"देविका रोटवान" भारत की एक शेरनी

आईये आज और ऐक "छिपे हुये हिरो" कि दास्तान से अवगत कराता हूँ , 
और एक सडी हुई व्यवस्था, मरी हुई कौम, गलीच, स्वार्थी और भ्रष्टाचारी लोगों की वजह से एक जिंदगी कैसे बर्बाद हो रही है। दास्ताँ पढिए..

जबसे मैंने मुंबई की "देविका रोटवान" के बारे में पढ़ा है .....तबसे सिस्टम और उसके हरामी नौकरशाही से नफरत दस गुना बढ़ गयी है .......

देविका रोटवांन वही लड़की है जिसकी गवाही पे कसाब को फांसी हुई थी .....
आपको बता दें की देविका मुंबई हमलों के दौरान महज 9 साल की थी ..उसने अपनी आँखों से कसाब को गोली चलाते देखा था ..

लेकिन जब उसे सरकारी गवाह बनाया गया तो उसे पाकिस्तान से धमकी भरे फोन कॉल आने लगे .....देविका की जगह अगर कोई और होता तो वो गवाही नहीं देता ..लेकिन इस बहादुर लड़की ने ना सिर्फ कसाब के खिलाफ गवाही दी बल्कि सीना तान के बिना किसी सुरक्षा के मुंबई हमले के बाद भी 5 साल तक अपनी  उसी झुग्गी झोपडी में रही ...

लेकिन इस देश भक्ति के बदले उसे क्या मिला ??....लोगों ने साथ तक नही दिया

आपको बता दें की देविका रोटवान जब सरकारी गवाह बनने को राजी हो गयी तो उसके बाद उसे उसके स्कुल से निकाल दिया गया ..क्यों की स्कूल प्रशासन का कहना था की आपकी लड़की को आतंकियों से धमकी मिलती है ..जिससे हमारे दुसरे स्टूडेंट्स को भी जान का खतरा पैदा हो सकता है ....

देविका के रिश्तेदारों ने उससे दूरी बना ली ..क्यों की उन्हें पाकिस्तानी आतंकियों से डर लगता था जो लगातर देविका को धमकी देते थे ....देविका को सरकारी सम्मान जरुर मिला ..
उसे हर उस समारोह में बुलाया जाता था जहाँ मुंबई हमले के वीरों और शहीदों को सम्मानित किया जाता था ..लेकिन देविका बताती है की सम्मान से पेट नहीं भरता ...
मकान मालिक उन्हें तंग करता है उसे लगता है की सरकार ने देविका के परिवार को सम्मान के तौर पे करोडो रूपये दिए हैं ..
जबकि असलियत ये हैं की देविका को अपनी देशभक्ति की बहुत भरी कीमत चुकानी पड़ी है ...

देविका का परिवार देविका का नाम अपने घर में होने वाली किसी शादी के कार्ड पे नहीं लिखवाता ..क्यों की उन्हें डर है की इससे वर पक्ष शादी उनके घर में नहीं करेगा ..क्यों की देविका आतंकियों के निशाने पे है ......

देविका के परिवार ने अपनी आर्थिक तंगी की बात कई बार राज्य सरकार और पीएमओ तक भी पहुचाई लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात निकला ...
देविका की माँ 2006 में ही गुजर गयी है ...

देविका के घर में आप जायेंगे तो उसके साथ कई नेताओं ने फोटो खिचवाई है ..कई मैडल रखे हैं ..लेकिन इन सब से पेट नहीं चलता ...देविका बताती है की उसके रिश्तेदारों को लगता है की हमें सरकार से करोडो रूपये इनाम मिले है ..लेकिन असल स्थिति ये हैं की दो रोटी के लिए भी उनका परिवार महंगा है .....
आतंकियों से दुश्मनी के नाम पर देविका के परिवार से उसके आस पास के लोग और उसकी कई दोस्तों ने उससे दूरी बना ली ..की कहीं आतंकी देविका के साथ साथ उन्हें भी ना मार डाले ........

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और डीएम ऑफिस के कई चक्कर लगाने के बाद उधर से जवाब मिला की हमारे जिम्मे एक ही काम नहीं है .......

देविका के पिता बताते हैं की उन्होंने अधिकारीयों से कहा की cm साहब ने मदद करने की बात कही थी .....सरकारी बाबू का कहना है की रिटन में लिखवा के लाइए ........
तब आगे कार्यवाही के लिए भेजा जाएगा ..........

अब आप बताइये की क्या ऐसे देश ..ऐसे समाज ..और ऐसी ही भ्रष्ट सरकारी मशीनरी के लिए देविका ने पैर में गोली खायी थी ...??
उसे क्या जरूरत थी सरकारी गवाह बनने की ??
उसे स्कुल से निकाल दिया गया ??
क्यों की उसने एक आतंकी के खिलाफ गवाही दी थी .....

 .....ऐसे खुद गरज समाज ..सरकार ....और नेताओं के लिए अपनी जान दाव पे लगाने की कोई जरूरत नहीं है ...

देविका तुमने बिना मतलब ही अपनी जिन्दगी नरक बना ली ......
सलमान खान एक देशद्रोही संजय दत्त ..और अब एक वैश्या सन्नी लियोन के ऊपर बायोपिक बनाने वाला बॉलीवुड तो देविका के मामले में महा मा**चो निकला ...

आपको बता दें की देविका का interview लेने के लिए  बॉलीवुड निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने देविका को अपने घर बुलाया लेकिन उसे आर्थिक मदद देना तो दूर उसे ऑटो के किराए के पैसे तक नहीं दिए ....ऐसा संवेदन हीन है अपना समाज ...थूकता हूँ मै ऐसे समाज पे ....

शायद कितनो को तो देविका के बारे पता भी नहीं होगा की देविका  रोटवान कौन है ........

थू है ऐसी व्यवस्था पे ..
ज्यादा से ज्यादा "शेयर" किजीये hकि इस शेर दिल बच्ची को इस समाज मे इज्जत के साथ इसे उचित सम्मान मिले...
🙏🏻🙏🏻🙏

Friday, June 25, 2021

कैलाश पर्वत क्षेत्र पर रुके एक माह तो 2 वर्ष 6 माह की जिंदगी गुजर जाती है।


 कैलाश मानसरोवर को भगवान शिव का निवास स्थल माना जाता है। कहा जाता है कि इस पर्वत पर भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। जो भी इस पर्वत पर आकर उनके दर्शन कर लेता है उसका जीवन पूरी तरह से सफल हो जाता है। इस पावन स्थल पर हर साल लाखों श्रद्धालु मन में सिर्फ ये आस लिए आते हैं कि शिव के साक्षात दर्शन मात्र से उनके सारे कष्ट मिट जाएंगे। कैलाश पर्वत को धरती का केंद्र कहा जाता है, जहां धरती और आकाश एक साथ आ मिलते हैं।

 कहते हैं कि कैलाश पर्वत के ठीक ऊपर स्वर्ग और ठीक नीचे धरती (मृत्युलोक) हैं।

 'परम रम्य गिरवरू कैलासू, सदा जहां शिव उमा निवासू।’

 पौराणिक और प्रसिद्ध  कथाओं के अनुसार मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत भगवान शिव का धाम है। आप ये तो जानते होंगे की कैलाश पर्वत पर भगवान शिव अपने परिवार के साथ रहते हैं पर ये नहीं जानते होंगे की वह इस दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी पर्वत हैं । कहा जाता है कि अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डार है।

 कैलाश पर्वत भारत में स्थित एक पर्वत श्रेणी है। इसके पश्चिम तथा दक्षिण में मानसरोवर तथा राक्षस ताल झील है। इस पवित्र पर्वत की ऊंचाई 6714 मीटर है । ऊंचाई के मामले में कैलाश पर्वत, विश्व विख्यात माउंट एवरेस्ट से ज्यादा विशाल तो नहीं है, लेकिन कैलाश की भव्यता उसके आकार में है। ध्यान से देखने पर यह पर्वत शिवलिंग के आकार का लगता है, जो पूरे साल बर्फ की चादर ओढ़े रहता है। कैलाश पर्वत अमरनाथ यात्रा पर जाते समय रास्ते में आता हैं। तिब्बत की हिमालय रेंज में स्थित हैं।

 कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्त्रोतों से घिरा है सिंध, ब्रह्मपुत्र, सतलज और कर्णाली या घाघरा तथा दो सरोवर इसके आधार हैं पहला मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकर सूर्य के सामान है तथा राक्षस झील जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के सामान है कैलाश-मानसरोवर जाने के अनेक मार्ग हैं किंतु उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थान से अस्ककोट, खेल, गर्विअंग, लिपूलेह, खिंड, तकलाकोट होकर जानेवाला मार्ग अपेक्षाकृत सुगम है।

 इसके एक ओर उत्तरी, तो दूसरी ओर दक्षिणी ध्रुव है। यहां एक ऐसा केंद्र भी है जिसे एक्सिस मुंडी कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। रशिया के वैज्ञानिकों के अनुसार एक्सिस मुंडी वह स्थान है, जहां अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं।

 यह पर्वत पिरामिडनुमा है। इसके शिखर पर कोई नहीं चढ़ सकता है। यहां 2 रहस्यमयी सरोवर हैं- मानसरोवर और राक्षस ताल। यहीं से भारत और चीन की बड़ी नदियों का उद्गम होता है। यहां निरंतर 'डमरू' या 'ॐ' की आवाज सुनाई देती है लेकिन यह आवाज कहां से आती है? यह कोई नहीं जानता। दावा किया जाता है कि कई बार कैलाश पर्वत पर 7 तरह की लाइटें आसमान में चमकती हुई देखी गई हैं। जब सूर्य की पहली किरण इस पर्वत पर पड़ती है, तो यह स्वर्ण-सा चमकने लगता है।

 कैलाश पर्वत की तलहटी में 1 दिन होता है 1 माह के बराबर ! इसका मतलब यह है कि 1 माह ढाई साल का होगा। दरअसल, वहां दिन और रात तो सामान्य तरीके से ही व्यतीत होते हैं लेकिन वहां कुछ इस तरह की तरंगें हैं कि यदि व्यक्ति वहां 1 दिन रहे तो उसके शरीर का तेजी से क्षरण होता है अर्थात 1 माह में जितना क्षरण होगा, उतना 1 ही दिन में हो जाएगा।

 इसे इस तरह समझें कि यदि सामान्य दिनों की तरह हमारे नाखूनों को हम 1 माह में 4 बार काटते हैं तो हमें वहां 1 दिन में 4 बार काटने होंगे।

 हाथ-पैर के नाखून और बाल अत्यधिक तेजी से बढ़ जाते हैं। सुबह क्लीन शेव रहे व्यक्ति की रात तक अच्छी-खासी दाढ़ी निकल आती है।

 कैलाश पर्वत पर कंपास काम नहीं करता यहाँ आने पर दिशा भ्रम होने लगता है. यह जगह बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव है। लेकिन ये जगह बेहद पावन, शांत और शक्ति देने वाली है!

 कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ सका सिर्फ एक बौध लामा को छोड़ कर ... ऐसा भी अनुभव होता है कि कैलाश की परिक्रमा मार्ग पर एक ऐसा खास पॉइंट आता है, जहां पर आध्यात्मिक शक्तियां आगे बढ़ने के विरुद्ध चेतावनी देती हैं। वहां तलहटी में तेजी से मौसम बदलता है। ठंड अत्यधिक बढ़ जाती है। व्यक्ति को बेचैनी होने लगती है। अंदर से कोई कहता है, 'यहां से चले जाओ।' जिन लोगों ने चेतावनी को अनसुना किया, उनके साथ बुरे अनुभव हुए। कुछ लोग रास्ता भटककर जान गंवा बैठे। कहते हैं कि सन् 1928 में एक बौद्ध भिक्षु मिलारेपा ही कैलाश पर्वत की तलहटी में जाने और उस पर चढ़ने में सफल रहे थे। मिलारेपा ही मानव इतिहास के एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्हें कि वहां जाने की आज्ञा मिली थी।

 मानस और सरोवर का संगम है कैलाश पर्वत
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 भगवान शिव का निवास स्थल ये कैलाश पर्वत खुद की तलहटी में कई रहस्य छुपाये है। कैलाश पर्वत से जुड़े कई ऐसे विचित्र रहस्य हैं जिसे आज तक दुनिया का कोई भी इंसान पता नहीं लगा पाया है। कैलाश मानसरोवर का नाम संस्कृत भाषा के दो शब्दों, मानस और सरोवर के संगम से मिलकर बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर. कैलाश पर्वत को पृथ्वी का केंद्र स्थल भी माना जाता है। चूँकि ये पर्वत मानसरोवर झील के नजदीक स्थित है इसलिए इसका नाम कैलाश मानसरोवर पड़ा है।

 शिव से मिलने के लिए लांघनी पड़ती है चीन की दीवार
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 समुद्र तट से लगभग 22068 फुट की ऊंचाई में बना कैलाश पर्वत हिमालय के उत्तरी दिशा में तिब्बत में स्थित है। चूंकि तिब्बत चीन की सीमा के अंतर्गत आता है अतः ये भी कहा जा सकता है कि भारत की आस्था का प्रतीक कैलाश मानसरोवर को पाने के लिए चीन की दीवार भी लांघना पड़ता है।

 कैलाश पर साक्षात विराजते हैं शिव
 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
 कैलाश मानसरोवर का एक और तिलिस्मी रहस्य भी है जिसके बारे में आज तक आप अनजान होंगे। क्या आपको पता है कि शिव के समीप ले जाने वाला ये पर्वत आज तक शिव की सच्चे भक्त की तलाश में है। जी हाँ आपने बिलकुल सही पढ़ा कैलाश मानसरोवर इतिहास रहा है कि कोई भी इंसान आज तक इस पर्वत की चोटी पर नहीं पहुंच पाया है। धार्मिक गुरु ये तक बताते हैं कि जो भी शिव के उस निवास स्थल तक पहुँच जाएगा उसे साक्षात शिव के दर्शन होंगे और वो शिव का सच्चा भक्त कहलायेगा।

 शिव के चरणों तक भी कोई नहीं पहुंचा आज तक

 आज तक कोई भी इंसान कैलाश पर्वत की चोटी पर कभी नहीं पहुंचा। जो भी गया है या तो उसने अपनी ज़िन्दगी को खत्म कर लिया या फिर हार मन कर वापस लौट आया। शिव के निवास स्थल से पहले भी काफी खतरनाक और ऊँची-ऊँची चोटियां पड़ती हैं जहां तक कुछ लोग पहुँचने में सफल भी हुए मगर आज तक शिव के चरणों तक कोई नहीं पहुँच पाया है।

 ।। ॐ नमः शिवाय ।।
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Tuesday, June 22, 2021

भारत के योगी

नेहरू 

अम्बेडकर

Monday, June 21, 2021

Painting of Sushruta school of ancient India (6th century BC)


This is the only surviving premodern painting which is depicting the students of the Sushruta school of ancient India (6th century BC).These students were trained in Vedas at the age of 8, then they were trained as surgeons for 6 yrs and taught the principles of Sushruta Samhita. They are shown performing mock surgery on water melons and cucumbers. As such, they are earliest recorded surgeons of World. This was found in an old manuscript of Sushruta Samhita which dates back to 600 years.

This illustration is from Odisha Museum.

This master literature remained preserved for many centuries exclusively in the Sanskrit language which prevented the dissemination. of the knowledge to the west and other parts of the world. Later the original text was lost and the present extant one is believed to be a revision by the Buddhist scholar Vasubandhu (circa AD 360-350). In the eighth century A.D., ‘Sushruta Samhita' was translated into Arabic as Kitab-Shaw Shoon-a-Hindi and Kitab-i-Susrud. The translation of ‘Sushruta Samhita' was ordered by the Caliph Mansur (A.D.753 -774).11 One of the most important documents in connection with ancient Indian medicine is the Bower Manuscript, a birch-bark medical treatise discovered in Kuchar (in Eastern Turkistan), dated around AD 450 and is housed in the Oxford University library.12 The first European translation of ‘Sushruta Samhita' was published by Hessler in Latin and into German by Muller in the early 19th century. The first complete English translation was done by Kaviraj Kunja Lal Bhishagratna in three volumes in 1907 at Calcutta.1

The treatise's insight, accuracy and detail of the surgical descriptions are most impressive. In the book's 184 chapters, 1,120 conditions are listed, including injuries and illnesses relating to ageing and mental illness. The compendium of Sushruta includes many chapters on the training and practice of surgeons. The Sushruta Samhita describes over 120 surgical instruments.5,13 300 surgical procedures and classifies human surgery in 8 categories.

Friday, June 18, 2021

कितनी सच्चाई है इस कहानी में "महारानी का बेटा"

झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है. रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ?
वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुला कर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी.

अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी. ज्यादातर हिंदुस्तानियों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली.

1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा.

महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया. उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी बराबरी से थे.

आइये, दामोदर की कहानी दामोदर की जुबानी सुनते हैं –

15 नवंबर 1849 को नेवलकर राजपरिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ. ज्योतिषी ने बताया कि मेरी कुंडली में राज योग है और मैं राजा बनूंगा. ये बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई. तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया. गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे.

मां साहेब (महारानी लक्ष्मीबाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहॉजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए. मगर ऐसा नहीं हुआ.

डलहॉजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा. मां साहेब को 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी. इसके साथ ही महाराज की सारी सम्पत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी. मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा.

इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे. फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वो पैसा मुझे दे दिया जाएगा.

मां साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली. मेरे सेवकों (रामचंद्र राव देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था. मुझे खुद ये ठीक से याद नहीं. इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे.

नन्हें खान रिसालेदार, गनपत राव, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई. 22 घोड़े और 60 ऊंटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े. हमारे पास खाने, पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था. किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली. मई-जून की गर्मी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे. शुक्र था कि जंगल के फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई.

असल दिक्कत बारिश शुरू होने के साथ शुरू हुई. घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया. किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली. रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे.

मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपए, 9 घोड़े और चार ऊंट तय की. हम जिस जगह पर रहे वो किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी.

देखते-देखते दो साल निकल गए. ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपए थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे. मेरी तबियत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा. मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें.

मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया. मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपए दिए और जानवर वापस मांगे. उसने हमें सिर्फ 3 घोड़े वापस दिए. वहां से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए.

ग्वालियर के शिप्री में गांव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया. वहां तीन दिन उन्होंने हमें बंद रखा, फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया. मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया. वो एक-एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे.

हमारे ज्यादातर लोगों को पागलखाने में डाल दिया गया. मां साहेब के रिसालेदार नन्हें खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की.

उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है. रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है. बच्चे से तो सरकार को कोई नुक्सान नहीं. इसे छोड़ दीजिए पूरा मुल्क आपको दुआएं देगा.

फ्लिंक एक दयालु आदमी थे, उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की. वहां से हम अपने विश्वस्तों के साथ इंदौर के कर्नल सर रिचर्ड शेक्सपियर से मिलने निकल गए. हमारे पास अब कोई पैसा बाकी नहीं था.

सफर का खर्च और खाने के जुगाड़ के लिए मां साहेब के 32 तोले के दो तोड़े हमें देने पड़े. मां साहेब से जुड़ी वही एक आखिरी चीज हमारे पास थी.

इसके बाद 5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में 10,000 सालाना की पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी. उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली. ब्रिटिश सरकार ने सात लाख रुपए लौटाने से भी इंकार कर दिया.

दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया. 1879 में उनके एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ.दामोदर राव के दिन बहुत गरीबी और गुमनामी में बीते। इसके बाद भी अंग्रेज उन पर कड़ी निगरानी रखते थे। दामोदर राव के साथ उनके बेटे लक्ष्मणराव को भी इंदौर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी।
इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में ‘झांसीवाले’ सरनेम के साथ रहते हैं. रानी के एक सौतेला भाई चिंतामनराव तांबे भी था. तांबे परिवार इस समय पूना में रहता है. झाँसी के रानी के वंशज इंदौर के अलावा देश के कुछ अन्य भागों में रहते हैं। वे अपने नाम के साथ झाँसीवाले लिखा करते हैं। जब दामोदर राव नेवालकर 5 मई 1860 को इंदौर पहुँचे थे तब इंदौर में रहते हुए उनकी चाची जो दामोदर राव की असली माँ थी। बड़े होने पर दामोदर राव का विवाह करवा देती है लेकिन कुछ ही समय बाद दामोदर राव की पहली पत्नी का देहांत हो जाता है। दामोदर राव की दूसरी शादी से लक्ष्मण राव का जन्म हुआ। दामोदर राव का उदासीन तथा कठिनाई भरा जीवन 28 मई 1906 को इंदौर में समाप्त हो गया। अगली पीढ़ी में लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव हुए। कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव, अरूण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव, अतुल चंद्रकांत राव और शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए।

दामोदर राव चित्रकार थे उन्होंने अपनी माँ के याद में उनके कई चित्र बनाये हैं जो झाँसी परिवार की अमूल्य धरोहर हैं। 

उनके वंशज श्री लक्ष्मण राव तथा कृष्ण राव इंदौर न्यायालय में टाईपिस्ट का कार्य करते थे ! अरूण राव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से बतौर जूनियर इंजीनियर 2002 में सेवानिवृत्त हुए हैं। उनका बेटा योगेश राव सॅाफ्टवेयर इंजीनियर है। वंशजों में प्रपौत्र अरुणराव झाँसीवाला, उनकी धर्मपत्नी वैशाली, बेटे योगेश व बहू प्रीति का धन्वंतरिनगर इंदौर में सामान्य नागरिक की तरह माध्यम वर्ग परिवार हैं। 

Friday, May 28, 2021

श्री गंगू मेहतर बाल्मीकि

ये हैं श्री गंगू मेहतर बाल्मीकि, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और 200 के लगभग अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था तथा उन्हें 18- 9 -1857 को कानपुर में चौराहे पर फाँसी दी गई थी इन वीर क्रांतिकारी योद्धा को शत शत नमन । बताते हैं इनका नाम इतिहास में गुमनाम है और नाही कोई ऊनकी याद मे प्रतिमा। क्युकि आजादी तो चरखे से आई है और महान तो अकबर है। आइए इन महान राष्ट्रभक्त के नाम पर "भारत माता की जय" बोलते हैं।

Saturday, May 22, 2021

भारत का पहला कंप्यूटर Bharat first computer

भारत का पहला कंप्यूटर, टाटा इंस्टीट्यूट द्वारा 1951 में निर्मित किया गया था और उसे अंतरिक्ष अनुसंधान विभाग को सौंप दिया गया। 

Sunday, May 16, 2021

द्वारका भारती एक मोची कम साहित्यकार।

12 वीं पास ये सज्जन करते हैं मोची का काम, देते हैं यूनिवर्सिटियों में लैक्चर और इनके साहित्य पर हो रही है रिसर्च
    टांडा रोड के साथ लगते मुहल्ला सुभाष नगर के द्वारका भारती (75) 12 वें पास हैं। घर चलाने के लिए मोची का काम करते हैं। सुकून के लिए साहित्य रचते हैं। भले ही वे 12 वीं पास हैं, पर साहित्य की समझ के कारण उन्हें वर्दीवालों को लेक्चर देने में बुलाया जाता है। कई भाषाओं में साहित्यकार इनकी पुस्तकों का अनुवाद कर चुके हैं। इनकी स्वयं की लिखी कविता एकलव्य इग्नू में एमए के बच्चे पढ़ते हैं, वहीं पंजाब विश्वविद्यालय में 2 होस्टल इन उपन्यास मोची पर रिसर्च कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यवसाय आपका भरण पोषण करे, वह इतना अधम हो ही नहीं सकता, जिसे करने में आपको शर्मिंदगी महसूस होगी।

द्वारका बोले- घर चलाने को गांठता हूँ जूते, सुकून के लिए रचता हूँ साहित्य
सुभाष नगर में प्रवेश करते ही अपनी किराए की छोटी सी दुकान पर आज भी द्वारका भारती हाथों से नए नए जूते तैयार करते हैं। अक्सर उनकी दुकान के बाहर बड़े गाड़ियों में सवार साहित्य प्रेमी अधिकारियों और साहित्यकारों की पहुंचना और साहित्य पर चर्चा करना दिन का हिस्सा हैं। चर्चा के दौरान भी वह अपने काम से जी नहीं चुराते और पूरे मनोयोग से जूते गांठते रहते हैं। फुरसत के पलों में भारती दर्शन और कार्ल मार्क्स के अलावा पश्चिमी व लैटिन अमेरिकी साहित्य का अध्ययन करते हैं।

 
डॉ.सुरेन्द्र की लेखनी से साहित्य की प्रेरणा मिली

   द्वारका भारती ने बताया कि 12 वीं तक पढ़ाई करने के बाद 1983 में होशियारपुर लौटे, तो वह अपने पुश्तैनी पेशे जूते गांठने में जुट गए। साहित्य से लगाव बचपन से था। डॉ.सुरेन्द्र अज्ञात की क्रांतिकारी लेखनी से प्रभावित हो उपन्यास जूठन का पंजाबी भाषा में किया गया। उपन्यास को पहले ही साल बेस्ट सेलर उपन्यास का खिताब मिला। इसके बाद पंजाबी उपन्यास मशालची का अनुवाद किया गया। इस दौरान दलित दर्शन, हिंदुत्व के दुर्ग पुस्तक लेखन के साथ ही हंस, दिनमान, वागर्थ, शब्द के अलावा कविता, कहानी व निबंध भी लिखे।

    द्वारका भारती ने बताया कि आज भी समाज में बर्तन धोने और जूते तैयार करने वाले मोची के काम को लोग हीनता की दृष्टि से देखते हैं, जो नकारात्मक सोच को दर्शाता है। आदमी को उसकी पेशा नहीं बल्कि उसका कर्म महान बनाता है। वह घर चलाने के लिए जूते तैयार करते हैं, वहीं मानसिक खुराक व सुकून के लिए साहित्य की रचना करते हैं। जूते गांठना हमारा पेशा है। इसी से मेरा घर व मेरा परिवार का भरण पोषण होता है।
  ऐसे कर्मयोगी को हमारा नमन है।

Tuesday, April 20, 2021

ऐमप्लीफाईड ग्लोबल 5G इलैक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन


दुनिया की बड़ी खबर, 
इटली ने किया मृत कोरोना मरीज का पोस्टमार्टम,
हुआ बड़ा खुलासा
इटली विश्व का पहला देश बन गया है जिसनें एक कोविड-19 से मृत शरीर पर अटोप्सी  (पोस्टमार्टम) किया और एक व्यापक जाँच करने के बाद पता लगाया है कि वायरस के रूप में कोविड-19 मौजूद नहीं है, बल्कि यह सब एक बहुत बड़ा ग्लोबल घोटाला है। लोग असल में “ऐमप्लीफाईड ग्लोबल 5G इलैक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन (ज़हर)” के कारण मर रहे हैं।

इटली के डॉक्टरों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के कानून का उल्लंघन किया है, जो कि करोना वायरस से मरने वाले लोगों के मृत शरीर पर आटोप्सी (पोस्टमार्टम) करने की आज्ञा नहीं देता ताकि किसी तरह की वैज्ञानिक खोज व पड़ताल के बाद ये पता ना लगाया जा सके कि यह एक वायरस नहीं है, बल्कि एक बैक्टीरिया है जो मौत का कारण बनता है, जिस की वजह से नसों में ख़ून की गाँठें बन जाती हैं यानि इस बैक्टीरिया के कारण ख़ून नसों व नाड़ियों में जम जाता है और यही मरीज़ की मौत का कारण बन जाता है।
इटली ने इस वायरस को हराया है, ओर कहा है कि “फैलीआ- इंट्रावासकूलर कोगूलेशन (थ्रोम्बोसिस) के इलावा और कुछ नहीं है और इस का मुक़ाबला करने का तरीका आर्थात इलाज़ यह बताया है……..
ऐंटीबायोटिकस (Antibiotics tablets}
ऐंटी-इंनफ्लेमटरी ( Anti-inflamentry) और
ऐंटीकोआगूलैटस ( Aspirin) को लेने से यह ठीक हो जाता है।
ओर यह संकेत करते हुए कि इस बीमारी का इलाज़ सम्भव है, विश्व के लिए यह संनसनीख़ेज़  ख़बर इटालियन डाक्टरों द्वारा कोविड-19 वायरस से मृत लाशों की आटोप्सीज़ (पोस्टमार्टम) कर तैयार की गई है। कुछ और इतालवी वैज्ञानिकों के अनुसार वेन्टीलेटर्स और इंसैसिव केयर यूनिट (ICU) की कभी ज़रूरत ही नहीं थी। इस के लिए इटली में अब नए शीरे से प्रोटोकॉल जारी किए गए है ।
CHINA इसके बारे में पहले से ही जानता था मगर इसकी रिपोर्ट कभी किसी के सामने उसने सार्वजनिक नहीं की ।
कृपया इस जानकारी को अपने सारे परिवार, पड़ोसियों, जानकारों, मित्रों, सहकर्मीओं को साझा करें ताकि वो कोविड-19 के डर से बाहर निकल सकें ओर उनकी यह समझ मे आये कि यह वायरस बिल्कुल नहीं है बल्कि एक बैक्टीरिया मात्र है जो 5G रेडियेशन के कारण उन लोगो को नुकसान पहुँचा रहा है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम है। यह रेडियेशन इंफलामेशन और हाईपौकसीया भी पैदा करता है। जो लोग भी इस की जद में आ जायें उन्हें Asprin-100mg और ऐप्रोनिकस या पैरासिटामोल 650mg लेनी चाहिए । क्यों…??? ….क्योंकि यह सामने आया है कि कोविड-19 ख़ून को जमा देता है जिससे व्यक्ति को थ्रोमोबसिस पैदा होता है और जिसके कारण ख़ून नसों में जम जाता है और इस कारण दिमाग, दिल व फेफड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिसके कारण से व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और सांस ना आने के कारण व्यक्ति की तेज़ी से मौत हो जाती है।
इटली के डॉक्टर्स ने WHO के प्रोटोकॉल को नहीं माना और उन लाशों पर आटोप्सीज़ किया जिनकी मौत कोविड-19 की वजह से हुई थी। डॉक्टरों ने उन लाशो की भुजाओं, टांगों ओर शरीर के दूसरे हिस्सों को खोल कर सही से देखने व परखने के बाद महसूस किया कि ख़ून की नस-नाड़ियां फैली हुई हैं और नसें थ्रोम्बी से भरी हुई थी, जो ख़ून को आमतौर पर बहने से रोकती है और आकसीजन के शरीर में प्रवाह को भी कम करती है जिस कारण रोगी की मौत हो जाती है। इस रिसर्च को जान लेने के बाद इटली के स्वास्थ्य-मंत्रालय ने तुरंत कोविड-19 के इलाज़ प्रोटोकॉल को बदल दिया और अपने पोज़िटिव मरीज़ो को एस्पिरिन 100mg और एंप्रोमैकस देना शुरू कर दिया। जिससे मरीज़ ठीक होने लगे और उनकी सेहत में सुधार नज़र आने लगा। इटली स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक ही दिन में 14000 से भी ज्यादा मरीज़ों की छुट्टी कर दी और उन्हें अपने अपने घरों को भेज दिया।
स्रोत: *इटली स्वास्थ्य मंत्रालय*

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