Thursday, September 28, 2017

नीतिवान लभते  सुखं |


उस पांच सितारा ऑडिटोरियम के बाहर प्रोफेसर साहब की आलीशान कार आकर रुकी , प्रोफेसर बैठने को हुए ही थे कि एक सभ्य सा युगल याचक दृष्टि से उन्हें देखता हुआ पास आया और बोला ," साहब , यहां से मुख्य सड़क तक कोई साधन उपलब्ध नही है , मेहरबानी करके वहां तक लिफ्ट दे दीजिए आगे हम बस पकड़ लेंगे । "

  रात के साढ़े ग्यारह बजे प्रोफेसर साहब ने गोद मे बच्चा उठाये इस युगल को देख अपने "तात्कालिक कालजयी"  भाषण के प्रभाव में उन्हें अपनी कार में बिठा लिया । ड्राइवर कार दौड़ाने लगा ।

    याचक जैसा वह कपल अब कुटिलतापूर्ण मुस्कुराहट से एक दूसरे की आंखों में देख अपना प्लान एक्सीक्यूट करने लगा । पुरुष ने सीट के पॉकेट मे रखे मूंगफली के पाउच निकालकर खाना शुरू कर दिया बिना प्रोफेसर से पूछे /मांगे ।
लड़की भी बच्चे को छोड़ कार की तलाशी लेने लगी ।एक शानदार ड्रेस दिखी तो उसने झट से उठा ली और अपने पर लगा कर देखने लगी ।
  प्रोफेसर साहब अब सहन नही कर सकते थे ड्राइवर से बोले गाड़ी रोको ,लेकिन ड्राइवर ने गाड़ी नही रोकी बस एक बार पीछे पलटकर देखा , प्रोफेसर को झटका लगा ,अरे ये कौन है उनके ड्राइवर के वेश में ?? वे तीनों वहशियाना तरीके से हंसने लगे , प्रोफेसर साहब को अपने इष्टदेव याद आने लगे ,थोड़ा साहस एकत्रित करके प्रोफेसर साहब ने शक्ति प्रयोग का "अभ्यासहीन " प्रयास करने का विचार किया लेकिन तब तक वह पुरुष अपनी जेब से एक लाइटर जैसा पदार्थ निकाल चुका था और उसका एक बटन दबाते ही 4 इंच का धारदार चाकू बाहर आ चुका था प्रोफेसर साहब की क्रांति समयपूर्व ही गर्भपात को प्राप्त हुई ।

         प्रोफेसर साहब समझ चुके थे कि आज कोई बड़ी अनहोनी निश्चित है उन्होंने खुद ही अपना पर्स निकालकर सारे पैसे उस व्यक्ति के हाथ में थमा दिये  लेकिन वह व्यक्ति अब उनके आभूषणों की तरफ देखने लगा, दुखी मन से प्रोफेसर साहब ने अपनी अंगूठियां ,ब्रेसलेट और सोने के चेन उतार के उसके हाथ में धर दिए , अब वह व्यक्ति उनके गले में एक और लॉकेट युक्त चैन की तरफ हाथ बढ़ाने लगा । प्रोफेसर साहब याचना पूर्वक बोले - इसे छोड़ दो प्लीज यह मेरे "पुरुखों की निशानी " है जो कुल परंपरा से मुझ तक आई है , इसकी मेरे लिए अत्यंत भावनात्मक महत्ता है । लेकिन वह लुटेरा कहां मानने वाला था उसने आखिर वह निशानी भी उतार ही ली ।
                   बिना प्रोफ़ेसर साहब के पता बताएं वे  लोग उनके आलीशान बंगले के बाहर तक पहुंच गए थे ।
  युवक बोला ," लो आ गया घर , ऐसे ढेर सूखे मेवे , कपड़े , पैसा  और  प्रोफेसर  साहब की ल.......
        उसकी आँखों मे आई धूर्ततापूर्ण बेशर्म चमक ने शब्द के अधूरेपन को पूर्णता दे दी ।

      प्रोफेसर साहब अब पूरे परिवार की सुरक्षा एवं घर पर पड़े अथाह धन-धान्य को लेकर भी चिंतित हो गये उनका रक्तचाप उछाले मारने लगा लेकिन करें भी तो क्या ??
        लगे गिड़गिड़ाने ,"  भैया मैंने आपको आपत्ती में देखकर शरण दी और आप मेरा ही इस तरह शोषण कर रहे हैं यह अनुचित है । ईश्वर का भय मानिए यह निर्दयता की पराकाष्ठा है ।अब तो छोड़ दीजिए मुझे भगवान के लिए ।
     प्रोफेसर फूट फूट कर रोने लगे ।।

              वे पति पत्नी अपना बच्चा लेकर कार से उतर गये  और वह ड्राइवर भी , उनके द्वारा लिया गया सारा सामान उन्होंने वापस प्रोफेसर साहब के हाथ में पकड़ाया और  बोले
      
" क्षमा कीजिएगा सर ! रोहिंग्या मुसलमानों के विषय मे शरणागत वत्सलता पर आज आपके द्वारा उस ऑडिटोरियम मे  दिए गए "अति भावुक व्याख्यान"  का तर्कसंगत शास्त्रीय निराकरण करने की योग्यता हममें नहीं थी अतः हमें यह स्वांग रचना पड़ा  ।
  "आप जरा खुद को भारतवर्ष और हमें रोहिंग्या समझ कर इस पूरी घटना पर विचार कीजिए और सोचिये की  आपको अब क्या करना चाहिए इस विषय पर । "

   वो मूंगफली नही इस देश का अथाह प्राकृतिक संसाधन है जिसकी रक्षार्थ यंहा के सैनिक अपना उष्ण लाल लहू बहाकर करते है सर , मुफ्त नही है यह ।
   वो आपकी बेटी/बेटे की ड्रेस मात्र कपड़ा नही है इस देश के नागरिकों के स्वप्न है भविष्य के जिसके लिए यंहा के युवा परिश्रम का पुरुषार्थ करते है ,मुफ्त नही है यह ।
    आपकी बेटी / पत्नी मात्र नारी नही है देश की अस्मिता है सर जिसे हमारे पुरुखों ने खून के सागर बहा के सुरक्षित रखा है , खैरात में बांटने के लिए नही है यह ।
    आपका ये पर्स अर्थव्यवस्था है सर इस देश की जिसे करोड़ो लोग अपने पसीने से सींचते है , मुफ्त नही है यह ।

  और आपके पुरुखों की निशानी यह चैन मात्र सोने का टुकड़ा नही है सर , अस्तित्व है हमारा , इतिहास है इस महान राष्ट्र का जिसे असंख्य योद्धाओ ने मृत्यु की बलिवेदी पर ढेर लगाकर जीवित रखा है , मुफ्त तो छोड़िए इसे किसी ग्रह पर कोई वैज्ञानिक भी उत्पन्न नही कर सकते ।

   कुछ विचार कीजिये सर ! कौन है जो खून चूसने वाली जोंक को अपने शरीर पर रहने की अनुमति देता है , एक बुद्धिहीन चौपाया भी तत्काल उसे पेड़ के तने से रगड़ कर उससे मुक्ति पा लेता है ।

           उस युवक ने वह लाइटर जैसा रामपुरी चाकू  प्रोफेसर साहब के हाथ में देते हुए कहा यह मेरी प्यारी बहन जो आपकी पुत्री है उसे दे दीजिएगा सर क्योंकि अगर आप जैसे लोग रोहिंग्या को सपोर्ट देकर इस देश में बसाते रहे तो किसी न किसी दिन ऐसी ही किसी कार में आपकी बेटी को इसकी आवश्यकता जरूर पड़ेगी।

                 सर ज्ञान के विषय मे तो हम आपको क्या समझा सकते हैं लेकिन एक कहानी जरूर सुनिए ,

   "  लाक्षाग्रह के बाद बच निकले पांडव एकचक्रा नगरी में गए थे तब वहा कोई सराय वगैरह तो थी नहीं तो वे लोग एक ब्राह्मणि के घर पहुंचे और उन्हें शरण देने के लिए याचना की ।
         शरणागत धर्म के चलते हैं उस ब्राह्मणि ने उन्हें  शरण दी ,शीघ्र ही उन्हें (पांडवो) को पता चला कि यहां एक बकासुर नामक राक्षस प्रत्येक पक्षांत पर  एक व्यक्ति को बैलगाड़ी भरकर भोजन के साथ खा जाता है और इस बार उसी ब्राह्मणी के  इकलौते पुत्र की बारी थी , उस ब्राह्मणि के शरणागत धर्म के निष्काम पालन से प्रसन्न पांडवों ने धर्म की रक्षा के लिए , निर्बलों की सहायता के लिए और अपने शरण प्रदाता के ऋण से हल्के होने के लिए स्वयं भीम को उस ब्राह्मण के स्थान पर भेजा ।
       आगे सभी को पता ही है की भीम ने उस राक्षस कोे किस तरह पटक-पटक कर धोया था  लेकिन यह कहानी हमें सिखाती है की शरण किसे दी जाती है ??
         "जो आपके आपत्तिकाल मे आपके बेटे के बदले अपने बेटे को मृत्यु के सम्मुख प्रस्तुत कर सके वही शरण का सच्चा अधिकारी है । "

        उसी के लिए आप अपने संसाधन अपना हित अपना सर्वस्व त्याग करके उसे अपने भाई के समान शरण देते हैं और ऐसे कई उदाहरण इतिहास में उपलब्ध है ।

               प्रोफेसर साहब !  ज्ञान वह नहीं है जो किताबें पढ़कर आता है , सद्ज्ञान वह है जो ऐतिहासिक घटनाएं सबक के रूप में हमें सीखाती हैं और वही वरेण्य है ।
      वरना कई  पढ़े-लिखे महामूर्धन्य लोगों के मूर्खतापूर्ण निर्णयो का फल यह पुण्यभूमि आज भी भुगत ही रही है। आशा है आप हमारी इस धृष्टता को क्षमा करके हमारे संदेश को समझ सकेंगे ।

        प्रोफेसर साहब एक दीर्घनिश्वास के साथ उन्हें जाते हुए देख रहे थे  । आज वे ज्ञान का एक विशिष्ट प्रकाश अपने अंदर स्पष्ट देख पा रहे थे ।

जय हिंद ।।

#पुरोहितजी_कहिन

10 short stories with deep meanings.


Profound and heart rendering!

1) She was very excited
     today, after all the
     school was re-opening
     after a long summer
     break. Now, once
     again, she could start
     selling stationery at
     the traffic signal to
     feed her family.

2) She, a renowned artist
     and a strict mother,
     often scolded her 6-
     year-old son for he
     could never draw a
     line straight. As he
     breathed slowly into   
     the ventilator, she
     begged him to make
     one more crooked line
     on the ECG.

3) "Everyone goes with
      the flow… but the one 
     who goes against it
     becomes someone
     remarkable.” Before I
     could explain this to
     the traffic police, the
     man issued me a fine.

4) Their love was
     different. She was
     happy every time he
     kicked her in the
     stomach. Every time
     he kicked she loved
     him more. She waited
     for the time she would
     hold her baby for the
     first time.

5) All my toys are yours..!
     Read her brother’s   
     death note.

6) They took his father,
     and only returned a
     flag.

7) At 25, I became a
     mother of one; at 27 I
     became a mother of
     two; and today, at 55, I
     have become a
     mother of three!  My
     son got married today,
     and brought home his
     wife!

8) “Born to rich parents,
      this boy is so lucky,”
      exclaimed the
      neighbors!
      Somewhere in
      heaven, three unborn
      sisters cried.

9) “You ruined my career,
      I was supposed to be
      an Executive Director,”
      she thought to
      herself.  The little
      angel held her finger
      tightly and she forgot
      everything; A mother
      was born.

10) Once a 5-year-old boy
       was standing
       barefoot in the
       shallow water of the
       ocean. He was
       repeating the same
       sentence to the
       waves – “Even if you
       touch my feet a
       thousand times, I
       won’t forgive you for
       taking my parents   
       away.

Breath taking! Aren't they?

Wednesday, August 23, 2017

मस्तिष्क आघात के मरीज़ को कैसे पहचानें?

डा महेश सिन्हा की एक बहुत उपयोगी पोस्ट ---

मस्तिष्क आघात --जी वही, जिसे कईं बार ब्रेन-स्ट्रोक भी कह दिया जाता है अथवा आम भाषा में दिमाग की नस फटना या ब्रेन-हैमरेज भी कह देते हैं।
इस के बारे में पोस्ट डाक्टर साहब लिखते हैं ----

एक पार्टी चल रही थी, एक मित्र को थोड़ी ठोकर सी लगी और वह गिरते गिरते संभल गई और अपने आस पास के लोगों को उस ने यह कह कर आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक है, बस नये बूट की वजह से एक ईंट से थोड़ी ठोकर लग गई थी। (आस पास के लोगों ने ऐम्बुलैंस बुलाने की पेशकश भी की).
साथ में खड़े मित्रों ने उन्हें साफ़ होने में उन की मदद की और एक नई प्लेट भी आ गई। ऐसा लग रहा था कि इन्ग्रिड थोड़ा अपने आप में नहीं है लेकिन वह पूरी शाम पार्टी तो एकदम एन्जॉय करती रहीं। बाद में इन्ग्रिड के पति का लोगों को फोन आया कि कि उसे हस्पताल में ले जाया गया लेकिन वहां पर उस ने उसी शाम को दम तोड़ दिया।

दरअसल उस पार्टी के दौरान इन्ग्रिड को ब्रेन-हैमरेज हुआ था --अगर वहां पर मौजूद लोगों में से कोई इस अवस्था की पहचान कर पाता तो आज इन्ग्रिड हमारे बीच होती।

ठीक है ब्रेन-हैमरेज से कुछ लोग मरते नहीं है -- लेकिन वे सारी उम्र के लिये अपाहिज और बेबसी वाला जीवन जीने पर मजबूर तो हो ही जाते हैं।

जो नीचे लिखा है इसे पढ़ने में केवल आप का एक मिनट लगेगा ---

स्ट्रोक की पहचान ---

एक न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं कि अगर स्ट्रोक का कोई मरीज़ उन के पास तीन घंटे के अंदर पहुंच जाए तो वह उस स्ट्रोक के प्रभाव को समाप्त (reverse)भी कर सकते हैं---पूरी तरह से। उन का मानना है कि सारी ट्रिक बस यही है कि कैसे भी स्ट्रोक के मरीज़ की तुरंत पहचान हो, उस का निदान हो और उस को तीन घंटे के अंदर डाक्टरी चिकित्सा मुहैया हो, और अकसर यह सब ही अज्ञानता वश हो नहीं पाता।

स्ट्रोक के मरीज़ की पहचान के लिये तीन बातें ध्यान में रखिये --और इस से पहले हमेशा याद रखिये ----STR.

डाक्टरों का मानना है कि एक राहगीर भी तीन प्रश्नों के उत्तर के आधार पर एक स्ट्रोक के मरीज की पहचान करने एवं उस का बहुमूल्य जीवन बचाने में योगदान कर सकता है.......इसे अच्छे से पढ़िये और मन में बैठा लीजिए

S ---Smile आप उस व्यक्ति को मुस्कुराने के लिये कहिए।

T-- talk उस व्यक्ति को कोई भी सीधा सा एक वाक्य बोलने के लिये कहें जैसे कि आज मौसम बहुत अच्छा है।

R --- Raise उस व्यक्ति को दोनों बाजू ऊपर उठाने के लिये कहें।

अगर इस व्यक्ति को ऊपर लिखे तीन कामों में से एक भी काम करने में दिक्कत है , तो तुरंत ऐम्बुलैंस बुला कर उसे अस्पताल शिफ्ट करें और जो आदमी साथ जा रहा है उसे इन लक्षणों के बारे में बता दें ताकि वह आगे जा कर डाक्टर से इस का खुलासा कर सके।

नोट करें ---- स्ट्रोक का एक लक्षण यह भी है --

1. उस आदमी को जिह्वा (जुबान) बाहर निकालने को कहें।
2. अगर जुबान सीधी बाहर नहीं आ रही और वह एक तरफ़ को मुड़ सी रही है तो भी यह एक स्ट्रोक का लक्षण है।

एक सुप्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर इस ई-मेल को पढ़ने वाला इसे आगे दस लोगों को भेजे तो शर्तिया तौर पर आप एक बेशकीमती जान तो बचा ही सकते हैं ....

और यह जान आप की अपनी भी हो सकती है -।

Suvichar 2017

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🍃मैं खुश हूँ कि कोई मेरी...
बात तो करता है....

बुरा कहता है तो क्या हुआ...
वो याद तो करता है ....

कौन कहता हैं की नेचर और सिग्नेचर कभी बदलता नही

बस एक चोट की ज़रूरत हैं

अगर ऊँगली पे लगी तो सिग्नेचर बदल जाता है,
और दिल पे लगी तो नेचर बदल जाता है।

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*लोग जल जाते हैं मेरी मुस्कान पर क्योंकि*
*मैंने कभी दर्द की नुमाइश नहीं की*
*जिंदगी से जो मिला कबूल किया*
*किसी चीज की फरमाइश नहीं की*
*मुश्किल है समझ पाना मुझे क्योंकि*
*जीने के अलग है अंदाज मेरे*
*जब जहां जो मिला अपना लिया*
*ना मिला उसकी ख्वाहिश नहीं की!!*

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भारतीय इतिहास का विकृतिकरण....Bharat ka Itihas!


इस सम्बन्ध में भारतीय धर्मग्रन्थों की चर्चा हो रही थी आज बात करते हैं रामायण और महाभारत की

भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व सभी भारतीयों को अपने प्राचीन साहित्य में, चाहे वह रामायण हो या महाभारत, पुराण हो या अन्य ग्रन्थ, पूर्ण निष्ठा थी। इसके संदर्भ में ‘मिथ‘ की मिथ्या धारणा अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा ही फैलाई गई क्योंकि अपने उद्देश्य की प्राप्ति की दृष्टि से उनके लिए ऐसा करना एक अनिवार्यता थी। बिना ऐसा किए इन ग्रन्थों में उल्लिखित ऐतिहासिक तथ्यों की सच्चाई से बच पाना उनके लिए कठिन था। जबकि भारतीय ग्रन्थ यथा- रामायण, महाभारत, पुराण आदि भारत के सच्चे इतिहास के दर्पण हैं। इनके तथ्यों को यदि मान लिया जाता तो अंग्रेज लोग भारत के इतिहास-लेखन में मनमानी कर ही नहीं सकते थे। अपनी मनमानी करने के लिएही उन लोगों ने भारत के प्राचीन ग्रन्थों के लिए ‘मिथ‘, ‘अप्रामाणिक‘, ‘अतिरंजित‘, ‘अविश्वसनीय‘ जैसे शब्दों का न केवल प्रयोग ही किया वरन अपने अनर्गल वर्णनों को हर स्तर पर मान्यता भी दी और दिलवाई। फलतः आज भारत के ही अनेक विद्वान उक्त ग्रन्थों के लिए ऐसी ही भावना रखने लगे जबकि ये सभी ग्रन्थ ऐतिहासिक तथ्यों से परिपूर्ण हैं।

रामायण

वाल्मीकि ने श्रीराम की कथा के माध्यम से उनसे पूर्व के लाखों-लाखों वर्षों के भारत के इतिहास को सामने रखते हुए भारत के स्वर्णिम अतीतका ज्ञान बड़े ही व्यापक रूप में वर्णित किया है। रामायण की कथा की ऐतिहासिकता के संदर्भ में महर्षिव्यास का महाभारत में यह कथन सबसे बड़ा प्रमाण है, जो उन्होंने वन पर्व में श्रीराम की कथा का उल्लेखकरते हुए कहा है - ‘राजन ! पुरातन काल के इतिहास में जो कुछ घटित हुआ है अब वह सुनो‘। यहाँ‘पुरातन‘ और ‘इतिहास‘, दोनों ही शब्द रामायण की कथा की प्राचीनता और ऐतिहासिकता प्रकट कर रहे हैं। यही नहीं, श्रीराम की कथा की ऐतिहासिकता का सबसे प्रबल आधुनिक युग का वैज्ञानिक प्रमाण अमेरिकाकी ‘नासा‘ संस्था द्वारा 1966 में और भारत द्वारा 1992 में छोड़े गए अन्तरिक्ष उपग्रहों ने श्रीराम द्वारा लंका जाने के लिए निर्मित कराए गए सेतु के समुद्र में डूबे हुए अवशेषों के चित्र खींचकर प्रस्तुतकर दिया है।

इस कथा की ऐतिहासिकता का ज्ञान इस बात से भी हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड के नवम् सर्ग के श्लोक 5 में बताया गया है कि जब हनुमान जी सीता जी की खोज के लिए लंका में रावण के भवन के पास से निकले तो उन्होंने वहाँतीन और चार दाँतों वाले हाथी देखे। श्री पी. एन. ओक के अनुसार आधुनिक प्राणी शास्त्रियों का मानना है कि ऐसे हाथी पृथ्वी पर थे तो अवश्य किन्तु उनकी नस्ल को समाप्त हुए 10 लाख वर्ष से अधिक समय हो गया। दूसरे शब्दों में श्रीराम की कथा दस लाख वर्ष से अधिक प्राचीन तो है ही साथ ही ऐतिहासिक भी है।

महाभारत

यह महर्षि वेदव्यास की महाभारत युद्ध के तुरन्त बाद ही लिखी गई एक कालजयी कृति है। इसे उनकी ही आज्ञा से सर्पसत्र के समय उनके शिष्य वैषम्पायन ने राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय को सुनाया था, जिसका राज्यकाल कलि की प्रथम शताब्दी में रहा था अर्थात इसकी रचना को 5000 साल बीत गए हैं। यद्यपि इसकी कथा में एक परिवार के परस्पर संघर्ष का उल्लेख किया गया है परन्तु उसकी चपेट में सम्पूर्ण भारत ही नहीं अन्य अनेक देश भी आए हैं। फिर भी सारी कथा श्रीकृष्ण के चारों ओर ही घूमती रही है। यह ठीक है कि आज अनेकलेखक श्रीकृष्ण के भू-अवतरण को काल्पनिक मान रहे हैं किन्तु वे भारत के एक ऐतिहासिक पुरुष हैं, इसका प्रमाण भारत का साहित्य ही नहीं आधुनिक विज्ञान भी प्रस्तुत कर रहा है।

समुद्र में तेल खोजते समय भारतीय अन्वेषकों को 5000 वर्ष पूर्व समुद्र में डुबी श्रीकृष्ण जी की द्वारिका के कुछ अवशेष दीखे। खोज हुई और खोज में वहाँ मिली सामग्री के संदर्भ में 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री द्वारा लोकसभा में दिए गएएक प्रश्न के उत्तर में बताया गया था कि वहाँ मिली सामग्री में 3 छिद्रित लंगर, मोहरें, उत्कीर्णित जार, मिट्टी के बर्तन, फ्लेग पोस्ट के साथ-साथ एक जेटी (घाट) आदि उल्लेखनीय हैं। महाभारत युद्ध का कालभारतीय पौराणिक कालगणना के अनुसार आज से 5144-45 वर्ष पूर्व का है। द्वारिका की खोज ने भारतीय पुरातन साहित्य में उल्लिखित श्रीकृष्ण और द्वारिका के साथ-साथ महाभारत की कथा को ‘मिथ‘ की कोटि से निकाल कर इसे इतिहास भी सिद्ध कर दिया है।

पुराण

पुराण भारतीय जन-जीवन के ज्ञान के प्राचीनतम स्रोतों में से हैं। इन्हें भारतीय समाज में पूर्ण सम्मान दिया जाता रहा है। पुराणों को श्रुति अर्थात वेदों के समान महत्त्व दिया गया है - ‘‘श्रुति-स्मृति उभेनेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम्‘‘ अर्थातश्रुति और स्मृति दोनों ही नेत्र हैं तथा पुराण हृदय। मनुस्मृति में श्राद्ध के अवसर पर पितरों को वेद और धर्मशास्त्र के साथ-साथ इतिहास और पुराणों को सुनाने के लिए कहा गया है। पुराणों की कथाओं का विस्तार आज से करोड़ों-करोड़ों वर्ष पूर्व तक माना जाता है। इनके अनुसार सृष्टि का निर्माण आज से 197 करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व हुआ था। पहले इस बात को कपोल-कल्पित कहकर टाला जाता रहा है किन्तु आज तोविज्ञान भी यह बात स्पष्ट रूप में कह रहा है कि पृथ्वी का निर्माण दो अरब वर्ष से अधिक पूर्व में हुआ था। दूसरे शब्दों में पुराणों में कही गई बात विज्ञान की कसौटी पर सही पाई गई है। अतः इनकी प्रामाणिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है। पुराणों से सृष्टि रचना, प्राणी की उत्पत्ति, भारतीय समाज के पूर्व पुरुषों के कार्य की दिशा, प्रयास और मन्तव्य के ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न मानव जातियों की उत्पत्ति, ज्ञान-विज्ञान, जगत के भिन्न-भिन्न विभागों के पृथक-पृथक नियमों आदि का भी पता चलता है। इनमें देवताओं और पितरों की नामावली के साथ-साथ अयोध्या, हस्तिनापुर आदि के राजवंशों का महाभारत युद्ध के 1504 वर्ष के बाद तक का वर्णन मिलता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि पुराणों की रचना महाभारत के 1500 वर्षों के बाद हुई है। विभिन्न भारतीय विद्वानों का कहना है कि पुराण तो प्राचीन हैं किन्तु उनमें राजवंशों के प्रकरण समय-समय पर संशोधित किए जाते रहे हैं। यही कारण है कि अलग-अलग पुराणों में एक ही वंश के राजाओं की संख्या में अन्तर मिल जाता है, क्योंकि यह वंश के प्रसिद्ध राजाओं की नामावली है वंशावली नहीं। उदाहरण के लिए- सूर्यवंश के राजाओं की संख्याविष्णु पुराण में 92, भविष्य में 91, भागवत में 87 और वायु में 82 दी गई है। लगता है संशोधनों केही समय इनमें कुछ बातें ऐसी भी समाविष्ट हो गई हैं जिनके कारण इनकी कुछ बातों की सत्यता पर ऊँगली उठा दी जाती है।

कल पुराणों के सम्बन्ध में कुछ और तथ्यों की बात करेंगे ...

ज्योतिषाचार्य जयकांत शर्मा कौण्डिन्य-8287374774

विद्वान और विद्यावान में अन्तर!


🔸विद्यावान गुनी अति चातुर ।
      राम काज करिबे को आतुर ॥

🔶  एक होता है विद्वान और एक विद्यावान । दोनों में आपस में बहुत अन्तर है । इसे हम ऐसे समझ सकते हैं, रावण विद्वान है और हनुमान जी विद्यावान हैं ।

🔶  रावण के दस सिर हैं । चार वेद और छह: शास्त्र दोनों मिलाकर दस हैं । इन्हीं को दस सिर कहा गया है । जिसके सिर में ये दसों भरे हों, वही दस शीश हैं । रावण वास्तव में विद्वान है । लेकिन विडम्बना क्या है ? सीता जी का हरण करके ले आया । कईं बार विद्वान लोग अपनी विद्वता के कारण दूसरों को शान्ति से नहीं रहने देते । उनका अभिमान दूसरों की सीता रुपी शान्ति का हरण कर लेता है और हनुमान जी उन्हीं खोई हुई सीता रुपी शान्ति को वापिस भगवान से मिला देते हैं । यही विद्वान और विद्यावान में अन्तर है ।

🔶  हनुमान जी गये, रावण को समझाने । यही विद्वान और विद्यावान का मिलन है । हनुमान जी ने कहा --

🔸विनती करउँ जोरि कर रावन ।
      सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥

🔶  हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं विनती करता हूँ, तो क्या हनुमान जी में बल नहीं है ? नहीं, ऐसी बात नहीं है । विनती दोनों करते हैं, जो भय से भरा हो या भाव से भरा हो । रावण ने कहा कि तुम क्या, यहाँ देखो कितने लोग हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़े हैं ।

🔸कर जोरे सुर दिसिप विनीता ।
      भृकुटी विलोकत सकल सभीता ॥

🔶  रावण के दरबार में देवता और दिग्पाल भय से हाथ जोड़े खड़े हैं और भृकुटी की ओर देख रहे हैं । परन्तु हनुमान जी भय से हाथ जोड़कर नहीं खड़े हैं । रावण ने कहा भी --

🔸कीधौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही ।
      देखउँ अति असंक सठ तोही ॥

🔶  रावण ने कहा - "तुमने मेरे बारे में सुना नहीं है ? तू बहुत निडर दिखता है !" हनुमान जी बोले - "क्या यह जरुरी है कि तुम्हारे सामने जो आये, वह डरता हुआ आये ?" रावण बोला - "देख लो, यहाँ जितने देवता और अन्य खड़े हैं, वे सब डरकर ही खड़े हैं ।"

🔶  हनुमान जी बोले - "उनके डर का कारण है, वे तुम्हारी भृकुटी की ओर देख रहे हैं ।"

🔸भृकुटी विलोकत सकल सभीता ।

🔶  परन्तु मैं भगवान राम की भृकुटी की ओर देखता हूँ । उनकी भृकुटी कैसी है ? बोले --

🔸भृकुटी विलास सृष्टि लय होई ।
      सपनेहु संकट परै कि सोई ॥

🔶  जिनकी भृकुटी टेढ़ी हो जाये तो प्रलय हो जाए और उनकी ओर देखने वाले पर स्वप्न में भी संकट नहीं आए । मैं उन श्रीराम जी की भृकुटी की ओर देखता हूँ ।

🔶  रावण बोला - "यह विचित्र बात है । जब राम जी की भृकुटी की ओर देखते हो तो हाथ हमारे आगे क्यों जोड़ रहे हो ?

🔸विनती करउँ जोरि कर रावन ।

🔶  हनुमान जी बोले - "यह तुम्हारा भ्रम है । हाथ तो मैं उन्हीं को जोड़ रहा हूँ ।" रावण बोला - "वह यहाँ कहाँ हैं ?" हनुमान जी ने कहा कि "यही समझाने आया हूँ । मेरे प्रभु राम जी ने कहा था --

🔸सो अनन्य जाकें असि
           मति न टरइ हनुमन्त ।
      मैं सेवक सचराचर
           रुप स्वामी भगवन्त ॥

🔶  भगवान ने कहा है कि सबमें मुझको देखना । इसीलिए मैं तुम्हें नहीं, तुझमें भी भगवान को ही देख रहा हूँ ।" इसलिए हनुमान जी कहते हैं --

🔸खायउँ फल प्रभु लागी भूखा ।
      और सबके देह परम प्रिय स्वामी ॥

🔶  हनुमान जी रावण को प्रभु और स्वामी कहते हैं और रावण --

🔸मृत्यु निकट आई खल तोही ।
      लागेसि अधम सिखावन मोही ॥

🔶  रावण खल और अधम कहकर हनुमान जी को सम्बोधित करता है । यही विद्यावान का लक्षण है कि अपने को गाली देने वाले में भी जिसे भगवान दिखाई दे, वही विद्यावान है । विद्यावान का लक्षण है --

🔸विद्या ददाति विनयं ।
      विनयाति याति पात्रताम् ॥

🔶  पढ़ लिखकर जो विनम्र हो जाये, वह विद्यावान और जो पढ़ लिखकर अकड़ जाये, वह विद्वान । तुलसी दास जी कहते हैं --

🔸बरसहिं जलद भूमि नियराये ।
      जथा नवहिं वुध विद्या पाये ॥

🔶  जैसे बादल जल से भरने पर नीचे आ जाते हैं, वैसे विचारवान व्यक्ति विद्या पाकर विनम्र हो जाते हैं । इसी प्रकार हनुमान जी हैं - विनम्र और रावण है - विद्वान ।

🔶  यहाँ प्रश्न उठता है कि विद्वान कौन है ? इसके उत्तर में कहा गया है कि जिसकी दिमागी क्षमता तो बढ़ गयी, परन्तु दिल खराब हो, हृदय में अभिमान हो, वही विद्वान है और अब प्रश्न है कि विद्यावान कौन है ? उत्तर में कहा गया है कि जिसके हृदय में भगवान हो और जो दूसरों के हृदय में भी भगवान को बिठाने की बात करे, वही विद्यावान है ।

🔶  हनुमान जी ने कहा - "रावण ! और तो ठीक है, पर तुम्हारा दिल ठीक नहीं है । कैसे ठीक होगा ? कहा कि --

🔸राम चरन पंकज उर धरहू ।
      लंका अचल राज तुम करहू ॥

🔶  अपने हृदय में राम जी को बिठा लो और फिर मजे से लंका में राज करो । यहाँ हनुमान जी रावण के हृदय में भगवान को बिठाने की बात करते हैं, इसलिए वे विद्यावान हैं ।

☀  सीख  :  विद्वान ही नहीं बल्कि "विद्यावान" बनने का प्रयत्न करें ।