Friday, July 5, 2019

राजाराम जाट वो हिन्दू शेर, जिसने 'अकबर' की कब्र खोदकर अस्थियाँ जला डाली थी

पूरे भारत में अपनी नीतियों के कारण मशहूर सम्राट अकबर की मौत के बाद ऐसा होगा, यह उस वक्त किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। बताते हैं कि औरंगजेब की हिन्‍दू विरोधी नीति से गुस्‍साए जाट राजा ने अकबर के मकबरे ‘सिकंदरा’ पर हमला कर दिया था। राजाराम ने कब्र खुदवा कर अकबर की हडि्डयां निकाल ली थी। चिता बनाकर इन हडि्डयों को हिन्‍दू रीति से जला दिया गया था।

उस वक्‍त औरंगजेब दक्षिण भारत में कई युद्धों में फंसा हुआ था। जाट राजा के इस आक्रमण से मकबरे से दस किलोमीटर दूर आगरा किला में मौजूद सेना डर से यहां नहीं पहुंची थी। बाद में राजाराम के भाई ने मकबरे में आग लगा दी थी।
   
इस बांके वीर द्वारा औरंगजेब की धर्म विरोधी नीतियों के खिलाफ विद्रोह के बारे में ठाकुर सुरजनसिंह शेखावत अपनी पुस्तक ‘गिरधर वंश प्रकाश’ जो राजस्थान के तत्कालीन खंडेला ठिकाने का वृहद् इतिहास है में लिखते है : –

मेवात प्रान्त के बृजमंडल-क्षेत्र के निवासी जाट,यद्धपि खेतिहर किसान थे, किन्तु वे जन्म-जात लड़ाकू वीर योद्धा भी थे | अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार हेतु शक्तिशाली सत्ता-बल से टकराने के लिए भी वे सदैव कटिबद्ध रहते थे | बादशाह औरंगजेब की हिन्दू धर्म विरोधी नीति व मथुरा व वृन्दावन के देवमन्दिरों को ध्वस्त करने के चलते उत्तेजित जाटों ने गोकुला के नेतृत्व में संगठित होकर स्थानीय मुग़ल सेनाधिकारियों से डटकर मुकाबला किया था | उनसे लड़ते हुए अनेक मुग़ल मनसबदार मारे गए | जाटों ने गांवों का लगान देना बंद कर दिया | मुग़ल सेना से लड़ते हुए गोकुला के मारे जाने पर सिनसिनी गांव के चौधरी भज्जाराम के पुत्र राजाराम जो अप्रतिम वीर एवं योद्धा था ने उस विद्रोह का नेतृत्व संभाला |

राजाराम ने बादशाह के खालसा गांव में जमकर लूटपाट की एवं दिल्ली आगरा के बीच आवागमन के प्रमुख मार्गों को असुरक्षित बना दिया |  जो भी मुग़ल सेनापति उसे दबाने व दण्डित करने के लिए भेजे गए वे सब पराजित होकर भाग छूटे |

राजाराम ने आगरा के समीप निर्मित सम्राट अकबर के भव्य एवं विशाल मकबरे को तोड़फोड़ कर वहां पर सुसज्जित बहुमूल्य साजसामान लुट लिया व कब्रों को खोदकर सम्राट अकबर व जहाँगीर के अवशेषों (अस्ति-पंजरों) को निकालकर अग्नि को समर्पित कर दिया | केसरीसिंह समर के वर्णानुसार :–

ढाही मसती बसती करी, खोद कबर करि खड्ड |
अकबर अरु जहाँगीर के , गाडे कढि हड्ड ||

केसरीसिंह समर का उक्त वर्णन अतिश्योक्ति न होकर एक प्रमाण-पुष्ट तथ्य है, जिसकी पुष्टि तत्कालीन फ्रेंच यात्री निकोलो-मनूची के यात्रा विवरण के निम्नांकित उल्लेख से भी होती है | उसने लिखा है –

‘The Sikandara was looted by jats in march 1688 A.D. Even the skelaton of Akbar the great,was taken out and the bones were consumed to flames ‘ (Storia-Mogor by Manucci)

प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहास लेखक विन्सेंट स्मिथ ने भी अपनी पुस्तक “अकबर दी ग्रेट मुग़ल”  में निकोलो-मनूची के उल्लेख की पुष्टि करते लिखा है: –

बादशाह औरंगजेब जब दक्षिण में मराठा युद्ध में सलंग्न था -मथुरा क्षेत्र के उपद्रवी जाटों ने सम्राट अकबर का मकबरा तोड़ डाला | उसकी कब्र खोदकर उसके अवशेष अग्नि में जला डाले | इस प्रकार अकबर की अंतिम आंतरिक -इच्छा की पूर्ति हुई |'(Akbar the great mugal-P328, vincent smith)

आगरा सूबा में नियुक्त मुग़ल सेनाधिकारियों से राजाराम का दमन नहीं किया जा सका, तो बादशाह ने आम्बेर के राजा बिशनसिंह को, जिसका पिता राजा रामसिंह उन्ही दिनों में मृत्यु को प्राप्त हुए थे - मथुरा का फौजदार बनाकर जाटों के विरुद्ध भेजा | राजा बिशनसिंह उस समय नाबालिग था सो लाम्बा का ठाकुर हरिसिंह उसका अभिभावक होने के नाते सभी कार्य संचालित करता था | ठाकुर हरीसिंह ने ही खंडेला के राजा केसरी सिंह जो खुद भी बाद में औरंगजेब का विद्रोही बना और शाही सेना से युद्ध करता हुआ वीर गति को प्राप्त हुआ था को समझाकर साथ ले आया था | हालांकि खंडेला का राजा केसरीसिंह उस वक्त शाही सेवा में नहीं था |

केसरीसिंह समर के अनुसार- ‘राजाराम को दण्डित करने हेतु राजा केसरीसिंह को भी शाही फरमान भेज कर आमंत्रित किया गया था | अपने भाई बांधवों के साथ केसरीसिंह ने युद्धार्थ प्रयाण किया | रेवाड़ी परगने के खोहरी नामक कस्बे के पास अपनी सैनिक चौकी स्थापित करके केसरीसिंह ने राजाराम के ठिकानों पर आक्रमण किए | राजाराम भी मुकाबले के लिए अपने साथियों के आया और दोनों दलों के बीच जमकर घोर युद्ध हुआ |  जाटों की सेना पराजित होकर समर-भूमि से पलायन कर गई |  “जाटों के नवीन इतिहास”  के अनुसार -राजाराम युद्ध में घायल होकर बंदी बना लिया गया था | सेना के मुग़ल सैनिकों ने उसका मस्तक काटकर बादशाह के पास भेज दिया |  इस प्रकार इस जाट वीर ने धर्म विरोधी शाही नीति के खिलाफ विद्रोह में वीर-गति प्राप्त की |

असल में अकबर की कब्र पर बहुत ही भव्य मकबरा बनवाया गया था।
लेकिन  राजाराम जाट ने वहां युद्ध करके हिन्दू विरोधी  अकबर और जहांगीर की कब्र उखाड़कर उनकी अस्थियां बाहर निकाल कर हिन्दू रीती के अनुसार जलवा दिया था।  अकबर ने जीते जी अपना मकबरा बनवा लिया था पर उसने सपने में भी नही सोचा होगा कि उसका मरने के बाद भी उसके साथ ये हाल होगा।

आज अगर उनकी कब्र होती तो सेक्युलर हिन्दू वहां  माथा टेकते मिलते।हमे गर्व है इस वीर पर जो आज उनके लिए उन अत्याचारियों की निशानी तक नही छोड़ी।

ढाही मसती बसती करी, खोद कबर करि खड्ड |
अकबर अरु जहाँगीर के , गाडे कढि हड्ड ||

बादशाह अकबर के अंतिम विश्राम कक्ष को छोड़ सारे मक़बरे में सोने, चांदी और रत्नों के साथ मीनाकारी की गई थी,  जो कि समय-समय पर लूट की बलि चढ़ते गए। मुगल साम्राज्य के अन्त के बाद ....एक जाट राजा
राम जाट मुगलों के प्रति अपना भयंकर गुस्सा को इस मक़बरे पर निकाला।उसने मक़बरे के भीतर भूसा भर कर उसे आग लगा दी.... और दीवारों और छतों पर लगा सोना-चांदी पिघला कर इकटठा किया।  खजाने के लालच में अकबर की कब्र को भी तोड़ा और आग लगाई,  इससे मक़बरे में भारी क्षति हु फिर बाद में अंग्रेजी हुकूमत के लार्ड करज़न ने इस मकब़रे की मुरम्मत करवाई, शायद यही बजह हैं कि भीतरी कक्ष इतना सादा है।

बादशाह अकबर की दोनों पुत्रियाँ... सकरुल निशा बेगम और अराम बानो की कब्र | अकबर की कब्र यह सिर्फ मूर्ख बनाने के लिए हे इनमे कुछ नहीं एक खोल हे बस |

भारत में औरंगज़ेब का शासन चल रहा था और हिन्दुओं का जीना मुश्किल हो गया था। औरंगज़ेब, जिसने अपने पिता को ही कैद कर लिया था, जिसने तख्त के लिए अपने भाइयॊं को ही मार दिया था वह भारत के हिन्दुओं को कैसे शांती से जीने दे सकता था?  हिन्दुओं पर औरंगज़ेब के अत्याचार दिन ब दिन बढ़ते ही जा रहे थे। औरंगज़ेब से लोहा लेने एक वीर बहादुर जाट तय्यार हो गया जिसका नाम था राजाराम। राजाराम जाट, भज्जासिंह का पुत्र था और सिनसिनवार जाटों का सरदार था। वह बहुमुखी प्रतिभा का धनी था, वह एक साहसी सैनिक और विलक्षण राजनीतिज्ञ था। उसने बड़ी चतुराई से जाटों के दो प्रमुख क़बीलों-सिनसिनवारों और सोघरियों (सोघरवालों) को आपस में मिलाया। सोघर गाँव सिनसिनी के दक्षिण-पश्चिम में था। रामचहर सोघरिया क़बीले का मुखिया था। राजाराम और रामचहर सोघरिया शीघ्र ही मुघलों के अत्याचारों का विरॊध करने लगे।

सिनसिनी से उत्तर की ओर, आऊ नामक एक समृद्ध गाँव था। यहाँ मुघलों का सैन्य दल नियुक्त था। लगभग 2,00,000 रुपये सालाना मालगुज़ारी वाले इस क्षेत्र में व्यवस्था बनाने के लिए एक चौकी बनाई गयी थी। इस चौकी अधिकारी का नाम था लालबेग, जो एक नीच पशु प्रव्रुत्ती का व्यक्ति था। एक दिन एक अहीर अपनी पत्नी के साथ गाँव के कुएँ पर विश्राम के लिए रुका। लालबेग का एक कर्मचारी उधर से गुज़र रहा था, वह अहीर युवती की अतुलनीय सुन्दरता को देखता है और तुरन्त लालबेग को ख़बर देता है। लालबेग अपने सिपाही भेजकर अहीर पती और पत्नी को जबरन अपने चौकी पर लाने को कहता है। उसके सिपाही पती को तो छोड़ देतें हैं लेकिन पत्नी को लालबेग के निवास में भेज देते हैं।

यह खबर आग की तरह फैल जाती है और राजाराम के कानों में पड़ती है। राजाराम ठान लेता है की वह मुघलों को सबक सिखा के ही रहेगा। उसने अपने सैन्य को युद्ध के लिए तय्यार किया और लालबेग को मारने की यॊजना बनाई। यॊजना के अंतर्गत वह अपने सिपाहियों के साथ गोवर्धन में वार्षिक मेले में जानेवाली घास की बैल गाड़ियों में छुप जाता है। लालबेग को अंदाज़ा भी नहीं था की राजाराम और उसके सिपाही घास के अंदर छुपे हुए हैं और वह गाड़ियों को अंदर जाने की अनुमति देता है। चौकी को पार करते ही राजारम और सिपाहियों ने गाड़ियों में आग लगा दिया। उसके बाद भयंकर युद्ध हुआ और उसमें लालबेग मारा गया।

इस युद्ध के बाद राजाराम ने अपने क़बीले को सुव्यवस्थित सेना बनाना प्रारम्भ कर दिया। अस्त्र-शस्त्रों से युक्त उसकी सेना अपने नायकों की आज्ञा मानने को हमेशा तय्यार रहती थी। राजाराम ने जाट-प्रदेश के सुरक्षित जंगलों में छोटी-छोटी क़िले नुमा गढ़ियाँ बनवादी। इन पर गारे की (मिट्टी की) परतें चढ़ाकर मज़बूत बनाया गया जिन पर तोप-गोलों का असर भी ना के बराबर था। राजाराम की चर्चे चारों दिशा में होने लगी। उसने मुघल शासन से विद्रोह कर उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। उसने धौलपुर से आगरा तक की यात्रा के लिए प्रति व्यक्ति से 200 रुपये लेना शुरू किया। इस एकत्रित धन को राजाराम अपने सैन्य को प्रशिक्षित करने में लगाता, जो मुघलों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारती थी। जिस प्रकार मुघलों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा था उसी प्रकार राजाराम उनके मकबरों और महलों को तोड़ते थे। राजाराम के भय से मुघलों ने बाहर निकलना बन्द कर दिया था।

राजाराम की वीरता की बात औरंगज़ेब के कानों तक भी पहुंची। उसने तुरन्त कार्रवाई की और जाट- विद्रोह से निपटने के लिए अपने चाचा, ज़फ़रजंग को भेजा। राजाराम ने उसको भी धूल चटाई। उसके बाद औरंगजेब ने युद्ध के लिए अपने बेटे शाहज़ादा आज़म को भेजा। लेकिन उसे वापस बुलाया और आज़म के पुत्र बीदरबख़्त को भेजा। बीदरबख़्त बालक था इसलिए ज़फ़रजंग को प्रधान सलाहकार बनाया। बार-बार के बदलावों से शाही फ़ौज में षड्यन्त्र होने लगे। राजाराम ने मौके का फ़ायदा उठाया, बीदरबख़्त के आगरा आने से पहले ही राजाराम ने मुग़लों पर हमला कर दिया।

सन् 1688, मार्च में राजाराम ने सिकंदरा में मुगलो  पर आक्रमण किया और 400 मुगल सैनिकों को काट दिया। कहते हैं की राजाराम ने अकबर और जहांगीर के कब्र को तोड़ कर उनकी अस्थियों को बाहर निकाला और जला कर राख कर दिया।

मनूची का कथन है कि जाटों ने काँसे के उन विशाल फाटकों को तोड़ा। उन्होंने बहुमूल्य रत्नों और सोने-चाँदी के पत्थरों को उखाड़ लिया और जो कुछ वे ले जा नहीं सकते थे, उसे उन्होंने नष्ट कर दिया था। राजाराम के साहस की चर्चा होती थी और मुगल शासक उनसे डरते थे। जिस युद्ध के बीज औरंगज़ेब के अत्याचारों ने बोए थे उसे राजाराम ने नष्ट कर दिया। औरंगज़ेब के अत्याचार, हिन्दू मन्दिरों के विनाश और मन्दिरों की जगह पर मस्जिदों का निर्माण करने से जनता के मन में बदले की भावना पनप चुकी थी। इसी कारण से लोग मुघल शासन के विरुद्द विद्रोह करने लगे थे।

राजाराम एक शूर वीर नायक की तरह उभर आया और मुगलो  को उसने धूल चटाई। 4 जुलाई 1688 को मुघलों से युद्ध करते समय धोखे से उन पर मुघल सैनिक ने पीछे से वार किया और वो शहीद हो गए। राजाराम का सिर काटकर औरंगज़ेब के दरबार मे पेश किया गया और रामचहर सोघरिया को जिंदा पकड़कर आगरा ले जाया गया जहां उनका भी सिर कलम कर दिया गया। हमारी किताबें हमें इन शूर-वीर नायकों के बारे में नहीं बताती और ना ही कोई इन पर सिनेमा बनाता है। ऐसा करने से भारत की सेक्यूलरिस्म खतरे में आ जाती है। हिन्दु राजाओं को दहशतगर्द बताकर मुघल मतांदों को महानायक बताना सेक्युलरिस्म है। भारत के सच्चे इतिहास को छुपाकर झूठ फैलाकर वर्षों से लोगों को मूर्ख बनाया गया है। सत्य को चाहे लाख छुपाए लेकिन सत्य नहीं छुपता और एक न एक दिन उजागर हॊता ही है।

जय हिन्दू वीर राजाराम जाट। जय हिन्दुत्व।

Thursday, July 4, 2019

अचार की एक फांक

#अचार_की_एक_फांक :-

गुरुकुल घरोंदा के एक आचार्य थे ।  वे जनसंघ के टिकट पर सांसद बन गए, तो उन्होंने सरकारी आवास नहीं लिया । वे दिल्ली के बाजार सीताराम, दिल्ली-6 के आर्य समाज मंदिर में ही रहते थे । वहाँ से संसद तक पैदल जाया करते थे कार्यवाही में भाग लेने।अपना समस्त वेतन रक्षा विभाग में दान कर देते थे।

वे ऐसे पहले सांसद थे, जो हर सवाल पूछने से पहले संसद में एक वेद मंत्र बोला करते थे। वे सब वेदमंत्र संसद की कार्यवाही के रिकार्ड में देखे जा सकते हैं। उन्होंने एक बार संसद का घेराव भी किया था, गोहत्या पर बंदी के लिए ।

एक बार इंदिरा जी ने किसी मीटिंग में उन स्वामी जी को पांच सितारा होटल में बुलाया। वहां जब लंच चलने लगा तो सभी लोग बुफे काउंटर की ओर चल दिये । स्वामी ही वहाँ नही गए । उन्होंने अपनी जेब से लपेटी हुई बाजरे की सूखी दो रोटी निकाली और बुफे काउंटर से दूर जमीन पर बैठकर खाने लगे।

इंदिरा जी ने कहा - "आप क्या करते हैं ? क्या यहां खाना नहीं मिलता ? ये सभी पांच सितारा व्यवस्थाएं आप सांसदों के लिए ही तो की गई है ।"

तो वे बोले - "मैं संन्यासी हूं। सुबह भिक्षा में किसी ने यही रोटियां दी थी । मैं सरकारी धन से रोटी भला कैसे खा सकता हूं।"

इंदिरा जी का धन्यवाद देते हुए होटल में उन्होंने इंदिरा से एक गिलास पानी और आम के अचार की एक फांक ली थी ।जिसका भुगतान भी उन्होंने इंदिरा जी के मना करने के बावजूद किया था !

जानते हैं यह महान सांसद और संन्यासी कौन थे?

ये थे सन्यासी स्वामी रामेश्वरानंद जी । कट्टर आर्य समाजी । परम गौ भक्त । अद्वितीय व्यक्तित्व के स्वामी जी ।

स्वामी जी हरियाणा के करनाल से सांसद थे ।

ऐसे अनेकों साधक हुए इस देव भूमि भारत पर , लेकिन हम नेहरू-गांधी के आगे देख नही पाए । शायद हमें पढ़ाया भी नहीं गया ।
कभी मौका लगे तो आप भी अवश्य जानिए ऐसे व्यक्तित्वों को ।
भारत को तपस्वियों का देश ऐसे ही नहीं कहा जाता ।

🇮🇳मेरा भारत महान🇮🇳

Tuesday, July 2, 2019

मेरी बेटी की शादी थी

मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा दिया. लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई.

‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे. मैं ने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी. इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर. मैं ने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला. पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया. लिखा था :

आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा. ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है. घर पर सभी को मेरा प्रणाम.
आप का, अमर.

मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए.

एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी. वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनयविनय करता और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर जा कर खड़ा हो जाता. मैं काफी देर तक मूकदर्शक की तरह यह नजारा देखता रहा. पहली नजर में यह फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों द्वारा की जाने वाली सामान्य सी व्यवस्था लगी, लेकिन उस लड़के के चेहरे की निराशा सामान्य नहीं थी. वह हर बार नई आशा के साथ अपनी कोशिश करता, फिर वही निराशा.

मैं काफी देर तक उसे देखने के बाद अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया और उस लड़के के पास जा कर खड़ा हो गया. वह लड़का कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था. मुझे देख कर उस में फिर उम्मीद का संचार हुआ और बड़ी ऊर्जा के साथ उस ने मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं. मैं ने उस लड़के को ध्यान से देखा. साफसुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण. ठंड का मौसम था और वह केवल एक हलका सा स्वेटर पहने हुए था. पुस्तकें मेरे किसी काम की नहीं थीं फिर भी मैं ने जैसे किसी सम्मोहन से बंध कर उस से पूछा, ‘बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?’

‘आप कितना दे सकते हैं, सर?’

‘अरे, कुछ तुम ने सोचा तो होगा.’

‘आप जो दे देंगे,’ लड़का थोड़ा निराश हो कर बोला.

‘तुम्हें कितना चाहिए?’ उस लड़के ने अब यह समझना शुरू कर दिया कि मैं अपना समय उस के साथ गुजार रहा हूं.

‘5 हजार रुपए,’ वह लड़का कुछ कड़वाहट में बोला.

‘इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,’ मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था फिर भी अनायास मुंह से निकल गया.

अब उस लड़के का चेहरा देखने लायक था. जैसे ढेर सारी निराशा किसी ने उस के चेहरे पर उड़ेल दी हो. मुझे अब अपने कहे पर पछतावा हुआ. मैं ने अपना एक हाथ उस के कंधे पर रखा और उस से सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, ‘देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले तो नहीं लगते, क्या बात है. साफसाफ बताओ कि क्या जरूरत है?’

वह लड़का तब जैसे फूट पड़ा. शायद काफी समय निराशा का उतारचढ़ाव अब उस के बरदाश्त के बाहर था.
‘सर, मैं 10+2 कर चुका हूं. मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं. मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है. अब उस में प्रवेश के लिए मुझे पैसे की जरूरत है. कुछ तो मेरे पिताजी देने के लिए तैयार हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,’ लड़के ने एक ही सांस में बड़ी अच्छी अंगरेजी में कहा.

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ मैं ने मंत्रमुग्ध हो कर पूछा?

‘अमर विश्वास.’

‘तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो. कितना पैसा चाहिए?’

‘5 हजार,’ अब की बार उस के स्वर में दीनता थी.

‘अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,’ इस बार मैं ने थोड़ा हंस कर पूछा.

‘सर, आप ने ही तो कहा कि मैं विश्वास हूं. आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं. मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं, आप पहले आदमी हैं जिस ने इतना पूछा. अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो मैं भी आप को किसी होटल में कपप्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,’ उस के स्वर में अपने भविष्य के डूबने की आशंका थी.

उस के स्वर में जाने क्या बात थी जो मेरे जेहन में उस के लिए सहयोग की भावना तैरने लगी. मस्तिष्क उसे एक जालसाज से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं था, जबकि दिल में उस की बात को स्वीकार करने का स्वर उठने लगा था. आखिर में दिल जीत गया. मैं ने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिन को मैं शेयर मार्किट में निवेश करने की सोच रहा था, उसे पकड़ा दिए. वैसे इतने रुपए तो मेरे लिए भी माने रखते थे, लेकिन न जाने किस मोह ने मुझ से वह पैसे निकलवा लिए.

‘देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में, तुम्हारी इच्छाशक्ति में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसीलिए कर रहा हूं. तुम से 4-5 साल छोटी मेरी बेटी भी है मिनी. सोचूंगा उस के लिए ही कोई खिलौना खरीद लिया,’ मैं ने पैसे अमर की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

अमर हतप्रभ था. शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था. उस की आंखों में आंसू तैर आए. उस ने मेरे पैर छुए तो आंखों से निकली दो बूंदें मेरे पैरों को चूम गईं.

‘ये पुस्तकें मैं आप की गाड़ी में रख दूं?’

‘कोई जरूरत नहीं. इन्हें तुम अपने पास रखो. यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना.’
वह मूर्ति बन कर खड़ा रहा और मैं ने उस का कंधा थपथपाया, कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी.

कार को चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने खेले जुए के बारे में सोच रहा था, जिस में अनिश्चितता ही ज्यादा थी. कोई दूसरा सुनेगा तो मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा. अत: मैं ने यह घटना किसी को न बताने का फैसला किया.

दिन गुजरते गए. अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी. मुझे अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नजर आई. एक अनजान सी शक्ति में या कहें दिल में अंदर बैठे मानव ने मुझे प्रेरित किया कि मैं हजार 2 हजार रुपए उस के पते पर फिर भेज दूं. भावनाएं जीतीं और मैं ने अपनी मूर्खता फिर दोहराई.

दिन हवा होते गए. उस का संक्षिप्त सा पत्र आता जिस में 4 लाइनें होतीं. 2 मेरे लिए, एक अपनी पढ़ाई पर और एक मिनी के लिए, जिसे वह अपनी बहन बोलता था. मैं अपनी मूर्खता दोहराता और उसे भूल जाता. मैं ने कभी चेष्टा भी नहीं की कि उस के पास जा कर अपने पैसे का उपयोग देखूं, न कभी वह मेरे घर आया. कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा. एक दिन उस का पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा है. छात्रवृत्तियों के बारे में भी बताया था और एक लाइन मिनी के लिए लिखना वह अब भी नहीं भूला.

मुझे अपनी उस मूर्खता पर दूसरी बार फख्र हुआ, बिना उस पत्र की सचाई जाने. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा. वह शायद आस्ट्रेलिया में ही बसने के विचार में था. मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. एक बड़े परिवार में उस का रिश्ता तय हुआ था. अब मुझे मिनी की शादी लड़के वालों की हैसियत के हिसाब से करनी थी. एक सरकारी उपक्रम का बड़ा अफसर कागजी शेर ही होता है. शादी के प्रबंध के लिए ढेर सारे पैसे का इंतजाम…उधेड़बुन…और अब वह चेक?

मैं वापस अपनी दुनिया में लौट आया. मैं ने अमर को एक बार फिर याद किया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया.

शादी की गहमागहमी चल रही थी. मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे और मिनी अपनी सहेलियों में. एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आ कर रुकी. एक संभ्रांत से शख्स के लिए ड्राइवर ने गाड़ी का गेट खोला तो उस शख्स के साथ उस की पत्नी जिस की गोद में एक बच्चा था, भी गाड़ी से बाहर निकले.

मैं अपने दरवाजे पर जा कर खड़ा हुआ तो लगा कि इस व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है. उस ने आ कर मेरी पत्नी और मेरे पैर छुए.

‘‘सर, मैं अमर…’’ वह बड़ी श्रद्धा से बोला.

मेरी पत्नी अचंभित सी खड़ी थी. मैं ने बड़े गर्व से उसे सीने से लगा लिया. उस का बेटा मेरी पत्नी की गोद में घर सा अनुभव कर रहा था. मिनी अब भी संशय में थी. अमर अपने साथ ढेर सारे उपहार ले कर आया था. मिनी को उस ने बड़ी आत्मीयता से गले लगाया. मिनी भाई पा कर बड़ी खुश थी.

अमर शादी में एक बड़े भाई की रस्म हर तरह से निभाने में लगा रहा. उस ने न तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली और न ही मेरे चाहते हुए मुझे एक भी पैसा खर्च करने दिया. उस के भारत प्रवास के दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गए.
इस बार अमर जब आस्ट्रेलिया वापस लौटा तो हवाई अड्डे पर उस को विदा करते हुए न केवल मेरी बल्कि मेरी पत्नी, मिनी सभी की आंखें नम थीं. हवाई जहाज ऊंचा और ऊंचा आकाश को छूने चल दिया और उसी के साथसाथ मेरा विश्वास भी आसमान छू रहा था.

*मैं अपनी मूर्खता पर एक बार फिर गर्वित था और सोच रहा था कि इस नश्वर संसार को चलाने वाला कोई भगवान नहीं हमारा विश्वास ही है.*

दुबई में हिंदू लड़कियों के हालात

दुबई में हिंदू लड़कियों के हालात पर अशोक भारती की रिपोर्ट

        मैने दुबई भ्रमण के दौरान होटलों रेस्तरां नाचघरों में  लड़कियां को काम करते हुए देखा, जब भी मैंने उनसे बात करने के प्रयास किया, वह सहम जाती थी रात को बाहर जाते समय उनके साथ 1-2 नीग्रो होते थे   मैने कई बार प्रयास किया ,फिर मैंने  एक पठान टैक्सी  ड्राईवर की मदद से नीग्रो को कुछ पैसे देकर बात करने पर राजी किया
          *और हमारी भेट १ भारतीय रेस्टोरेंट सागर रत्न में हुई। सभी लड़कियां भारत के अलग अलग भागों से अच्छे परिवारों से है और कुछ एक ने तो अपने परिवार से विद्रोह  करके अपने ही घर से चोरी करके  गहने-कैश लेकर अपने  मुस्लिम प्रेमी के साथ भाग कर  विवाह किया था और कुछ महीने प्रेमी के साथ बिताने के बाद दुबई घूमने आयी थी, और मुस्लिम लड़को ने उनके साथ ऐश करने के बाद  उन्हें  बेच दिया था। कुछ ने बताया कि उनका मुस्लिम पति दुबई में ही जॉब करता है और साथ रखने के लिए आई थी पर यहाँ बेच दिया गया*
          उनमें से ३ लड़कियां तो ऐसी थी जिन्हे १ ही मुस्लिम लड़के  अलग अलग स्थानों पर विवाह कर के यहाँ बेचा था,उन लड़कियों ने बताया कि हमारे अलावा भी बहुत सी लड़कियां है जो अलग अलग होटलों नाच घरों में नरक भोग रही है। अधिकतर  लड़कियां ने बताया कि उन्होंने बड़ा अपराध किया। और  उसकी सजा के रूप में नरक भोग रही है।*
         *मैने उन्हें वापिस भारत अपने घर लौटने के लिए कहा तो सब ने मना कर दिया ,अब उनके लिए भारत में कुछ नहीं है ,हम न तो परिवार और समाज को अपना मुँह दिखाने लायक  रही और न हमारे पास कोई दूसरा सोर्स जिससे अपने रहने खाने की व्यवस्था कर सके ,अब तो  इसी नरक रहना है और फिर भगवान् जाने क्या होगा जब आयु ढल जाएगी।*
         *लगभग सभी लड़कियां ने अपने पढाई पूरी नहीं की थी , स्कूल- कॉलेज की पढाई के दौरान ही प्यार हुआ और विवाह किया था , वैसे तो पूरे भारत से लड़कियां इस इस्लामिक जिहादियों के जाल में फसंती है पर सबसे अधिक उत्तराखंड से आई हुई थी। १ लड़की तो दिल्ली के पंजाबी सरकारी अफसर की बेटी थी ,और सब लड़कियां हिन्दू स्वर्ण समाज से ही थी ,वैसे नाम के लिए तो ये सभी लड़कियां होटल-रैस्टोरेंट  बार में काम  करती थी, पर वहाँ  आने वाले ग्राहकों को खुश रखने के लिए देह व्यापर करने पर भी बाध्य थी।*
        *मेरे बहुत अधिक आग्रह करने पर दिल्ली की २ लड़की अपने परिवार का पता और फोन नंबर देने पर राजी हुई। मेने उन्हें समझाया था कि मैं अपनी और से प्रयास करूँगा कि आपका परिवार आपको स्वीकार करें और आप इस नर्क से निकल कर वापिस भारत अपने परिवारों के साथ रहें। मेने दिल्ली में उनके परिवारों से मिलने के लिए गया। और उनकी बेटी की स्थति अवगत कराया पर दोनों के परिवार नहीं चाहते कि लड़कियां वापिस आएं। वे अब उनके लिए मर गई है। आत्मा तो मर ही गई है। पर देह जीवित है।*
          *मेरा अपने हिन्दू-सिक्ख भाई बहनों से निवेदन है कि अपने घरों बच्चों  के आसपास मंडराने हुए देंखे तो खुद भी सचेत हो जायें और बच्चों को भी जागरूक करें ,ताकि हमारी बेटियां इन जिहादियों के जाल में न फंसे*

        *पोस्ट को शेयर जरूर करें क्या पता आके एक पोस्ट्स किसी भीं की जिंदगी बच जाए और मुस्लिमों के नकली प्रेम जाल में फंसने वाली हिंदू लड़कियों की आंखें खुल जाए ।*

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श्री काशी विश्वनाथ

काशी का मूल विश्वनाथ मंदिर बहुत छोटा था। 17वीं शताब्दी में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसे सुंदर स्वरूप प्रदान किया। कहा जाता है कि एक बार रानी अहिल्या बाई होलकर के स्वप्न में भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्त थीं। इसलिए उन्होंने 1777 में यह मंदिर निर्मित कराया। सिख राजा रंजीत सिंह ने 1835 ई. में मंदिर का शिखर सोने से मढ़वा दिया। तभी से इस मंदिर को गोल्डेन टेम्पल नाम से भी पुकारा जाता है। यह मंदिर बहुत बार ध्वस्त हुआ। आज जो मंदिर स्थित है उसका निर्माण चौथी बार हुआ है। 1585 ई. में बनारस से आए मशहूर व्यापारी टोडरमल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 1669 ई. में जब औरंगजेब का शासन काल तब भी इस मंदिर को बहुत हानि पहुँचाया गया।

गंगा तट पर सँकरी विश्वनाथ गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है। यहाँ पर एक कुआँ भी है, जिसे ‘ज्ञानवापी’ की संज्ञा दी जाती है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक मंडप व गर्भगृह विद्यमान है। गर्भगृह के भीतर चाँदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग विद्यमान है। यह शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है। हालाँकि मंदिर का भीतरी परिसर इतना इतना व्यापक नहीं है, परंतु वातावरण पूरी तरह से शिवमय है।

#महिमा_और_मुख्य_तीर्थ-

सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलानाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन से छुट जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवंम दुखों परिपीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है। विश्वेश्वर के आनंद-कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं-

दशाश्वेमघ,

लोलार्ककुण्ड,

बिन्दुमाधव,

केशव और

मणिकर्णिका

ये पाँच प्रमुख तीर्थ हैं, जिनके कारण इसे ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा जाता है। काशी के उत्तर में ओंकारखण्ड, दक्षिण में केदारखण्ड और मध्य में विश्वेश्वरखण्ड में ही बाबा विश्वनाथ का प्रसिद्ध है। ऐसा सुना जाता है कि मन्दिर की पुन: स्थापना आदि जगत गुरु शंकरचार्य जी ने अपने हाथों से की थी।

ये दुनिया का इकलौता विश्वनाथ मंदिर जहां शक्ति के साथ विराजमान हैं शिव....द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ के दरबार में शिवरात्रि पर आस्था का जन सैलाब उमड़ता है। यहां वाम रूप में स्थापित बाबा विश्वनाथ शक्ति की देवी मां भगवती के साथ विराजते हैं। यह अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

#काशी_विश्वनाथ_मंदिर_से_जुड़े_11_फैक्ट्स ~

1. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है।

2. देवी भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही खुलता है। यहां मनुष्य को मुक्ति मिलती है और दोबारा गर्भधारण नहीं करना होता है। भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता। 

3. श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

4. विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है। तांत्रिक सिद्धि के लिए ये उपयुक्त स्थान है। इसे श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है।  

5. बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं :- 1. शांति द्वार। 2. कला द्वार। 3. प्रतिष्ठा द्वार। 4. निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार भी हो।

6. बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। इस कोण का मतलब होता है, संपूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार। तंत्र की 10 महा विद्याओं का अद्भुत दरबार, जहां भगवान शंकर का नाम ही ईशान है।

7. मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण मुख पर है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की ओर है। इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है। इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है। यहां से प्रवेश करते ही पूर्व कृत पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं।

8. भौगोलिक दृष्टि से बाबा को त्रिकंटक विराजते यानि त्रिशूल पर विराजमान माना जाता है। मैदागिन क्षेत्र जहां कभी मंदाकिनी नदी और गौदोलिया क्षेत्र जहां गोदावरी नदी बहती थी। इन दोनों के बीच में ज्ञानवापी में बाबा स्वयं विराजते हैं। मैदागिन-गौदौलिया के बीच में ज्ञानवापी से नीचे है, जो त्रिशूल की तरह ग्राफ पर बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि काशी में कभी प्रलय नहीं आ सकता।

9. बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।

10. बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं। मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं।

11. बाबा विश्वनाथ के अघोर दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं। उनके बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैं।