Thursday, May 9, 2019

बौद्धिक आतंकवाद बनाम बौद्धिक खालीपन


कुछ बुनियादी विषयों पर चुनावी/दलीय राजनीति से ऊपर उठ कर ही विचार करना चाहिए। धर्म-रक्षा, देश-सुरक्षा, प्रजा को दुष्टों-अपराधियों के त्रास से मुक्त करना ऐसे विषय हैं। इसी श्रेणी में शिक्षा-संस्कृति की चिन्ता भी रहनी चाहिए। अतः देश में प्रभावी बौद्धिकता पर भी केवल ‘पार्टी’ दृष्टि से विमर्श करना व्यर्थ होगा।

समाज और संस्कृति बहुत व्यापक विषय हैं। इस के सामने राजनीति, राजनीतिक दल बहुत छोटे हैं। चाहे आज राज्यसत्ता हर चीज को प्रभावित कर रही है। फिर भी, जिस समाज की जैसी सांस्कृतिक स्थिति है, उसी से वहाँ राजनीति का स्तर भी बनता है। उदाहरण के लिए, जैसा चुनाव-प्रचार भारत में दिखता है, वैसा इंग्लैंड में असंभव है, जबकि दोनों संसदीय लोकतंत्र हैं। अतः सामाजिक वस्तुस्थिति ही निर्धारक तत्व है।

स्वतंत्र भारत में आम जनता और बौद्धिक वर्ग की समझ में भारी अंतर रहा, और बढ़ता गया है। सामान्य लोग धर्म-भावना, सहज न्याय, और शांतिपूर्ण जीवन को महत्व देते हैं। बाकी चीजें इसके अनुरूप चाहते हैं, किन्तु बौद्धिक वर्ग अपनी आइडियोलॉजिकल टेक को सर्वोपरि मानता है, वह भी संपूर्णतः विदेशी, कृत्रिम निर्मितियों से बनी और बदलती टेक। पहले सोशलिज्म-समर्थन और कैपिटलिज्म-निन्दा से शुरू होकर आज वह सेक्यूलरिज्म, इन्क्लूसिवनेस, मायनोरिटी, दलित, गे-राइट्स, आदि के समर्थन तथा मेजोरिटेरियनिज्म, हिन्दुइज्म, ब्राह्मणिज्म, आदि की निन्दा विरोध पर टिका है। चाहे इन के अर्थों पर उसमें कोई स्पष्टता न हो। न ही उसे जनता की चाह से मतलब है। उसे तो जिद है कि जनता को क्या चाहना चाहिए!

इस प्रकार, यह कोरी पार्टी-बंदी वाला आइडियोलॉजिकल विमर्श या प्रचार मात्र रहा है। इसीलिए जब जनता किसी ऐसी माँग या दल को समर्थन दे, जो बौद्धिक वर्ग को पसंद नहीं, तो यह अपने विचारों की समिक्षा के बदले माथा-पच्ची करता है कि कैसे जनता को भ्रम मुक्त किया जाए । इसी को कुछ लोग "बौद्धिक आतंकवाद " का नाम देते हैं । अर्थात वामपंथी, सेकुलरवादी, इस्लामवादी, अलगाववादी, चर्च-पोषित दलितवादी, नव-गांधीवादी आदि बौद्धिकों ने सत्ता के सहयोग और छल-प्रपंच से अपनी बौद्धिक स्थापनाओं को देश की शिक्षा और पत्रकारिता में स्थापित किया है । विरोधी स्वरों को लांछन, गाली-गलौज से अपदस्थ करना उनका हथियार रहा है । इसका सच में ऐसा आतंक है कि अच्छे-अच्छे लोग अपनी वास्तविक अनुभूति लिखने बोलने से बचते हैं ।                            इस रूप में "बौद्धिक आतंकवाद " गलत संज्ञा नहीं है ! दशकों से उक्त बौद्धिक गुटों ने विविध राजनीतिक दलों के साथ लग कर छल-बल से अनेक ऐसी बातें शिक्षा तंत्र में जमा दी हैं, जो सारतः हिन्दू-विरोधी, विखंडनकारी और हिंसक है! चूँकि नेतागण प्रायः दलीय-स्वार्थों से अधिक न देख सकने वाले रहें, इसलिए उन्होंने यह स्थिति बेरोक बनने दी ।               इसमें सत्ताधारी और विरोधी दलों का समान योगदान रहा! क्योंकि गंभीर मुद्दों, यानी जिसे राजनीतिक दल जिसे गंभीर समझते हैं, उन पर वे विपक्ष में रहकर भी प्रभावी हस्ताक्षेप करते हैं । अनेक उदाहरण हैं, जब कोई नेता या मामूली दल भी दबाव बनाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय तक उलटवा देता है । अतः यदि बुनियादी विषयोंमें हानिकारक मान्यताएं शिक्षा तंत्र में जमती गई तो कारण यह भी था कि विरोधी दलों जिन में राष्टवादी या हिन्दूवादी अग्रणी थे,  उन्होंने उस हानिकारक प्रक्रिया का नोटिस नहीं लिया उसे मामूली समझकर उसका विरोध करने में समय या शक्ति नहीं लगाई ।              और, यही असल विडंबना है आज वे राष्ट्रीय सत्ता में है । पहले भी थे । राज्यों की सत्ता में तो वे दसकों से रहे तब ये "बौद्धिक आतंकवाद " खत्म/कमजोर करने के लिए उन्होंने क्यां किया?         उत्तर है कि वे निपट सूरदास बने रहें ! विपक्ष में रहते हुए जैसा गैर-जिम्मेदार रूख रखा, सत्ता में आकर भी निष्ठापूर्वक वहीं प्रदर्शित किया एक बार नहीं बार-बार ।                                          हाल का उदाहरण ले । वर्षों से बड़ी जिम्मेदारी लिए एक राष्ट्रवादी नेता ने भरी सभा में टीवी कैमरों में कहा कि उन्हें गर्व है कि उनके समय में इतिहास , साहित्य, राजनीति आदि की शिक्षा पर कोई 'कन्ट्रोवेंसी ' नहीं हुई । अर्थात वे जिस बौद्धिक आतंकवाद की निंदा करते हैं , उसे उन्होंने बेदस्तूर रहने दिया । जो विषैली, फुटपस्त,अलगाववादी, हिन्दू-धर्म द्वेषी, झूठी बाते विद्यार्थियों को पिलाई जाती रही है, वह बेरोक टोक चलती रही है । बल्कि उसे सूरदासी भाव में उन्होंने उसे उत्साहपूर्वक वहाँ भी फैलाया जहाँ अबतक नहीं पहुँची थी । इस प्रकार "बौद्धिक आतंकवाद " के समक्ष संगठित विकल्प केवल बौद्धिक दृष्टिहीनता, खालीपन का है । बौद्धिक आतंक की निंदा करके , अपनी पार्टी के लिए कुछ और समर्थन बढ़ाने की चाह के सिवा कोई लक्ष्य नहीं है । वस्तुतः विडंबना इससे भी गहरी है । बौद्धिक आतंक की निंदा करने वाले उन्हीं हानिकारक विचारों को फैलाने की व्यवस्था करते हुए , ठसक से दावा करते हैं कि वे भारत को "विश्व-गुरू " बना देंगे । यह सचमुच अर्वेलियन परिदृश्य है । जिस भारतीय महान ज्ञान-भंडार का विश्व में सदियों से आदर रहा, और आज भी है, क्योंकि उसकी मुल्यवत्ता स्थाई है- उसी ज्ञान को यहाँ औपचारिक शिक्षा में पूरी तरह अछूत, उपेक्षित बनाए रखना । जबकि ऐसा नहीं कि 'सांस्कृतिक ' राष्ट्रवादियों ने शिक्षा में बिल्कुल हस्ताक्षेप नहीं किया । पर उनकी बुद्धि सिर्फ इस पर लगी कि किस प्रकार अपनी पार्टी नेताओं को नेहरू-गाँधी जैसा कुछ सत्ता-सम्मान दिलाये । बकायदा निर्देश दिये गये कि उनके नेताओं के बारे में 'कुछ-ज्यादा ' पढ़ाया जाना चाहिए । दुसरे शब्दों में, यदि उपनिषदों से लेकर विवेकानंद, श्री अरविंद और जदुनाथ सरकार, राम स्वरूप, सीताराम गोयल तक महान चिंतक, विद्वान शिक्षा में बहिष्कृत रहें तो कोई उज्र नहीं । बस इनके पार्टी नेताओं पर कुछ सच्ची-झूठी बाते शिक्षा-तंत्र में जुड़ जाएं तो इसी से वो कृतार्थ होते हैं । इसलिए गत पन्द्रह बीस सालों में जब जहाँ 'राष्ट्रवादीयों ' को मौका मिला, उन्होंने अपने नेताओं के नाम पर विश्वविद्यालय से लेकर विभाग, चेयर, पीठ बनाये तथा अनगिनत भवन, सड़क, स्टेशन आदि के नामकरण भी किये ।                            यहि चाह उन्होंने समाजिक जीवन में भी प्रदर्शित की । जिसने आजीवन एक मौलिक पुस्तक तक नहीं लिखी , उनके नाम पर दर्जनों राष्ट्रीय सेमिनार, गोष्ठियां,संकलन, ग्रंथ आदि प्रकाशित कराए गए । किसी को ॠषि, तो किसी को दृष्टा, चिंतक आदि बनाने की कोशिश हुई, मानो प्रचार से ही वो नेहरू गांधी के समकक्ष या उपर हो जायेंगे । इस बीच वे घातक विचार जो दसकों से हमारे नौनिहालों, युवाओं को मतिभ्रष्ट करते रहें है, वे यथावत चल रहे हैं । उन विचारों की असलियत दिखा सकने वाले सच्चे विद्वानों , उनकी मौलिक पुस्तकों, पर कभी कोई गोष्ठी 'सांस्कृतिक ' राष्ट्रवादीयों ने नहीं की , न उस मूल्यवान साहित्य को प्रसारित किया । यदि किसी ने करना भी चाहा, तो उसे भी रोका । वे अपनी पार्टी साहित्य को पर्याप्त समझते हैं । अतः "बौद्धिक आतंकवाद " की तुलना में "बौद्धिक खालीपन " ही विकल्प रूप में प्रस्तुत हैं । शेष लोग या तो राह किनारे बेबस तमाशबीन, या उनकी दया के मोहताज हैं ।                    🤔🤔👏👺👺👺🤠🤠🤠

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