Saturday, July 27, 2019

In Mahabharat, Karna asks Lord Krishna

In Mahabharat, Karna asks Lord Krishna - "My mother left me the moment I was born. Is it my fault I was born an illegitimate child?

I did not get the education from Dhronacharya because I was considered not a Kshatriya.

Parsuraam taught me but then gave me the curse to forget everything when he came to know I was  Son of Kunthi belong to Kshatriya.

A cow was accidentally hit by my arrow & its owner cursed me for no fault of mine.

I was disgraced in Draupadi's Swayamvar.

Even Kunthi finally told me the truth only to save her other sons.

Whatever I received was through Duryodhana's charity.

So how am I wrong in taking his side ???"

**Lord Krishna replies, "Karna, I was born in a jail.

Death was waiting for me even before my birth.

The night I was born I was separated from my birth parents.

From childhood, you grew up hearing the noise of swords, chariots, horses, bow, and arrows. I got only cow herd's shed, dung, and multiple attempts on my life even before I could walk!

No Army, No Education. I could hear people saying I am the reason for all their problems.

When all of you were being appreciated for your valour by your teachers I had not even received any education. I joined Gurukula of Rishi Sandipani only at the age of 16!

You are married to a girl of your choice. I didn't get the girl I loved & rather ended up marrying those who wanted me or the ones I rescued from demons.

I had to move my whole community from the banks of Yamuna to far off Sea shore to save them from Jarasandh. I was called a coward for running away!!

If Duryodhana wins the war you will get a lot of credit. What do I get if Dharmaraja wins the war? Only the blame for the war and all related problems...

Remember one thing, Karna. Everybody has Challenges in life to face.

LIFE IS NOT FAIR & EASY ON ANYBODY!!!

But what is Right (Dharma) is known to your Mind (conscience). No matter how much unfairness we got, how many times we were Disgraced, how many times we Fall, what is important is how you REACTED at that time.

*Life's unfairness does not give you license to walk the wrong path...*

Always remember, Life may be tough at few points, but DESTINY is not created by the SHOES we wear but by the STEPS we take...

Thursday, July 25, 2019

डकैत की माँ

खटाक खटाक दो बार दरवाजे पर आवाज हुई .... देखो इतनी रात कौन आया है , मुखिया ने बीबी से कहा

जब उसने दरवाजा खोला तो सफ़ेद साड़ी में लिपटी हुई एक कृशकाय औरत काँप रही थी .... कुछ खाने को मिलेगा ? .... उन्होंने दरवाजा खोलने वाली औरत से मनुहार किया ....

चल भाग बुढ़िया यहाँ से .... कहकर उसने दरवाजा बन्द करना चाहा लेकिन वो बुढ़िया पैरों में गिर पड़ी .... और थोड़े से नमक की ही मनुहार करने लगी जिससे वो पास रखा कोदों खा सके लेकिन उसकी ना सुनी गयी और दरवाजा खटाक से बन्द हो गया

वो बुढ़िया और कोई नहीं बल्कि महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमर शहीद पंडित चन्द्र शेखर तिवारी "आज़ाद" की माँ जगरानी देवी थी

आज़ाद के शहीद होने के बाद जगरानी देवी का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया गया , गुलामी के जूते चाटते चाटते अंधे हो चुके ग्रामीणों द्वारा एक शहीद की माँ को डकैत की माँ कहकर बुलाया जाता रहा .... दुःख की बात ये है कि ये चीज़ देश के "आज़ाद" होने के बाद भी 1949 तक जारी रही

1949 में आज़ाद के सबसे विश्वासपात्र सैनिक सदाशिव ने जगरानी देवी को ढूंढ़ निकाला और अपने साथ झाँसी ले गए और अपने सेनापति की माँ को सगे बेटे से बढ़कर प्यार दिया और उनकी आस्थाओं के हिसाब उनको कंधे पर बिठाकर तीर्थयात्राएं कराई और उनको वो सारा सम्मान दिया जिसकी वो हक़दार थीं

1931 में नेहरू की मुखबिरी करने के कारण चंद्रशेखर आज़ाद के शहीद हो जाने पर जगरानी देवी पर मानों पहाड़ टूट पड़ा हो , जिसके मात्र 25 वर्षीय एकलौते बेटे ने मातृभूमि की सेवा के लिए अपनी जान दे दी हो उसके चरणों का पानी भी अमृत समझा जाना चाहिए लेकिन उनके साथ उसी वक़्त से सौतेला व्यवहार शुरू हो गया , आज़ाद के जाने के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एशोसिएशन ख़त्म हो गयी , सदाशिव को भी कालेपानी की सजा सुना दी गयी और फिर जगरानी देवी के दुर्दिन दिन शुरू हो गए जो लगातार 18 वर्षों तक जारी रहे ....वो जंगल से लकड़ी काटकर बेचतीं थीं और फिर बाजरा लाकर उसका घोल बनाकर पीतीं थीं किसी तरह उन्होंने अपने ज़िन्दगी के 18 वर्ष व्यतीत किये ... सदाशिव के कालेपानी की सजा ख़त्म होने के बाद उन्होंने जगरानी देवी को ढूंढ़ा और अपने साथ ले गए

जगरानी देवी के हृदय में अक्सर यह कसक रहती थी कि जिस देश के लिए उनके बेटे ने अमर बलिदान दिया उसी देश ने उन्हें भुला दिया .... और यही कसक लिए वो मार्च 1951 में इस संसार से विदा हो गयी

आज ही 23 जुलाई 1906 को इस माँ ने आज़ाद को जन्म दिया था ,

जब तक जिया.. मूछों पे ताव था,
गुलाम देश में वो एकलौता आज़ाद था ।

जयंती पर चंद्रशेखर आज़ाद जी को शत शत नमन 🙏🏻🙏🏻

शहीदों के चिताओं पर अब लगते नहीं मेले
वतन पर मिटने वालों का निशां अब कहाँ बाकी है

Wednesday, July 24, 2019

“मेरी ढाई शंका”

*एक चर्चित इस्लामिक स्टाल पर कुछेक लोगों की भीड़ देखकर मैं भी पहुँच गया। पता चला 'कुरान-ए-शरीफ़' की प्रति लोगों को मुफ़्त बाँटी जा रही है। शांति, प्रेम और आपसी मेलजोल को इस्लाम का संदेश बताया जा रहा था।*

*खैर जिज्ञासावश मैंने भी मुफ़्त में कुरान पाने को उनका दिया आवेदन फॉर्म भरने की ठानी जिसमें वो नाम-पता और मोबाइल नम्बर लिखवा रहे थे ताकि बाद में लोगों से सम्पर्क साधा जा सके।*

*एकाएक एक सज्जन अपनी धर्मपत्नी जी के साथ स्टाल में पधारे सामान्य अभिवादन से पश्चात उन्होंने मुस्लिम विद्वान् के सामने अपना विचार रखा - मैं अपनी धर्मपत्नी के साथ इस्लाम स्वीकार करना चाहता हूँ।*

*यह सुन मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर प्रसन्नत्ता की अनूठी आभा दिखाई दी।*
*मुस्लिम धर्मगुरु ने अपने दोनों हाथ खोलकर कहा - आपका स्वागत है।*
*लेकिन उन सज्जन ने कहा - इस्लाम स्वीकार करने से पहले मेरी 'ढाई' शंका है। आपको उनका निवारण करना होगा। यदि आप उनका निवारण कर पाए तो ही मैं इस्लाम स्वीकार कर सकता हूँ !!!*

*मुस्लिम विद्वान ने शंकित से भाव से उनकी ओर देखते हुए प्रश्न किया - महोदय, शंका या तो 'दो' हों या 'तीन'! ये 'ढाई' शंका का क्या तुक है?*
*सज्जन ने अपने मुस्कुराते हुए कहा - जब मैं शंका रखूँगा आप खुद समझ जायेंगे। यदि आप तैयार हो तो मैं अपनी पहली शंका आपके सामने रखूँ?*
*मुस्लिम विद्वान् ने कहा - जी, रखिये...*

*सज्जन - मेरी पहली शंका है कि सभी इस्लामिक बिरादरी के मुल्कों में जहाँ मुस्लिमों की संख्या 50 फीसदी से ज़्यादा है, मसलन 'मुस्लिम समुदाय' बहुसंख्यक हैं, उनमें एक भी देश में 'समाजवाद' नहीं है, 'लोकतंत्र नहीं है। वहाँ अन्य धर्मों में आस्था रखनेवाले लोग सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश में 'मुस्लिम' बहुसंख्यक होते हैं वहाँ कट्टर इस्लामिक शासन की माँग होने लगती है। मतलब उदारवाद नहीं रहता, लोकतंत्र नहीं रहता। लोगों से उनकी अभिवयक्ति की स्वतंत्रता छीन-सी ली जाती है। आप इसका कारण स्पष्ट करें, ऐसा क्यों? मैं इस्लाम स्वीकार कर लूँगा !!!*

*मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर एक शंका ने हजारों शंकाए खड़ी कर दीं। फिर भी उन्होंने अपनी शंकाओं को छिपाते हुए कहा - दूसरी शंका प्रकट करें...*

*सज्जन – मेरी दूसरी शंका है, पूरे विश्व में यदि वैश्विक आतंक पर नज़र डालें तो इस्लामिक आतंक की भागीदारी 95% के लगभग है। अधिकतर मारनेवाले आतंकी 'मुस्लिम' ही क्यों होते है? अब ऐसे में यदि मैंने इस्लाम स्वीकार किया तो आप मुझे कौन-सा मुसलमान बनायेंगे? हर रोज़ जो या तो कभी मस्ज़िद के धमाके में मर जाता, तो कभी ज़रा-सी चूक होने पर पर इस्लामिक कानून के तहत दंड भोगनेवाला या फिर वो मुसलमान जो हर रोज़ बम-धमाके कर मानवता की हत्या कर देता है! इस्लाम के नाम पर मासूमों का खून बहानेवाला या सीरिया की तरह औरतों को अगवाकर बाज़ार में बेचनेवाला! मतलब में मरनेवाला मुसलमान बनूँगा या मारनेवाला ?*

*यह सुनकर दूसरी शंका ने मानो उन विद्वान पर हज़ारों मन बोझ डाल दिया हो। दबी-सी आवाज़ में उन्होंने कहा - बाकी बची आधी शंका भी बोलो?..*
.
*सज्जन ने मंद-सी मुस्कान के साथ कहा - वो आधी शंका मेरी धर्मपत्नी जी की है... इनकी शंका 'आधी' इसलिए है कि इस्लाम नारी समाज को पूर्ण दर्जा नहीं देता। हमेशा उसे पुरुष की तुलना में आधी ही समझता है तो इसकी शंका को भी 'आधा' ही आँका जाये !*

*मुस्लिम विद्वान ने कुछ लज्जित से स्वर में कहा - जी मोहतरमा, फरमाइए!...*

*सज्जन की धर्मपत्नी जी ने बड़े सहज भाव से कहा - ये इस्लाम कबूल कर लें, मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं किन्तु मेरी इनके साथ शादी हुए करीब 35 वर्ष हो गये। यदि कल इस्लामिक रवायतों-उसूलों के अनुसार किसी बात पर इन्हें गुस्सा आ गया और मुझे 'तलाक-तलाक-तलाक' कह दिया तो बताइए मैं इस अवस्था में कहाँ जाऊँगी? यदि तलाक भी न दिया और कल इन्हें कोई पसंद आ गयी और ये उससे निकाह करके घर ले आये तो बताइए उस अवस्था में मेरा, मेरे  बच्चों का, मेरे गृहस्थ जीवन का क्या होगा ?
तो ये मेरी 'आधी' शंका है।*

*इस प्रश्न के वार से मुस्लिम विद्वान को निरुत्तर कर दिया। उसने इन जवाबों से बचने के लिए कहा - आप अपना परिचय दे सकते हैं...*
*सज्जन ने कहा - मेरी शंका ही मेरा परिचय है। यदि आपके पास इन प्रश्नों का उत्तर होगा, हमारी 'ढाई शंका' का निवारण आपके पास होगा तो आप मुझे बताना।*

*सज्जन तो वहाँ से चले गये पर मौलाना साहब सिर पकड़कर बैठे रहे। किन्तु इस सारे वार्तालाप से मेरे मन में ज़रूर एक शंका खड़ी हो गयी कि आखिर ये सज्जन कौन हैं...?*

*भारतीय लोग अग्रेषित करे...
*(जैसा प्राप्त हुआ वैसा ही भेजा गया) ।*
अगर कुछ गलत लिखा है तो कृपया सही कर सकते हैं.. 🙏
*pl correct or answer above?🙏

मनुस्मृति की जाँच (भाग−२) :-

राममोहन राय का फर्जी धर्मशास्त्र

(विकिपेडिया हिन्दू−विरोधी संस्था है,पाश्चात्य प्रोफेसरों और उनके भारतीय चेलों को ही प्रामाणिक मानने वाले इस लेख का कुछ अंश प्रस्तुत है,हू−ब−हू हिन्दी अनुवाद मैंने किया है जिसमें अपनी ओर से मैंने जो कुछ भी जोड़ा है वह ब्रैकेट में है । इस लेख में और भी कई रोचक तथ्य हैं,जैसे कि राममोहन राय जब फर्जी धर्मशास्त्र बनवा रहे थे तब घर से यह कहकर लापता थे कि बौद्ध धर्म सीखने के लिये तिब्बत गये हैं किन्तु एक ईसाई मिशनरी से पैसा ऐंठकर फर्जी धर्मशास्त्र बना रहे थे!सती प्रथा पर उनके “योगदान” पर मैं पहले ही प्रकाश डाल चुका हूँ । हमारे पाठ्यपुस्तकों से वे बातें भी छुपायी जाती हैं जो पाश्चात्य प्रोफेसर भी सही मानते हैं!)

https://en.wikipedia.org/wiki/Ram_Mohan_Roy#Christianity_and_the_early_rule_of_the_East_India_Company_(1795%E2%80%931828)
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इस अवधि के दौरान राम मोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी करते हुए एक राजनीतिक आन्दोलनकारी के रूप में काम किया ।

1792 में ब्रिटिश बैपटिस्ट मोची विलियम केरी ने अपनी प्रभावशाली मिशनरी पुस्तक प्रकाशित की :-

“असभ्यों के धर्मान्तरण वाले दायित्वों के निर्वाहन हेतु क्रिस्चियनों द्वारा साधनों का उपयोग” ।
(ईसाई पादरियों के लिये हिन्दुओं की गणना असभ्यों ⁄जंगलियों में  थी ।)

1793 में विलियम केरी भारत में बसने के लिए आये (लार्ड कॉर्नवालिस के गवर्नर जनरल बनते ही)। उनका उद्देश्य था भारतीय भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद, प्रकाशन और वितरण; तथा भारतीयों में ईसाईयत का प्रचार ।  उन्होंने महसूस किया कि "मोबाइल" (यानी सेवा वर्ग =ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौकरी में कार्यरत) ब्राह्मण और पण्डित इस प्रयास में उनकी मदद करने में सबसे अधिक कारगर थे, और विलियम केरी ने उन्हें इकट्ठा करना शुरू कर दिया । विलियम केरी  ने बौद्ध और जैन धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया ताकि सांस्कृतिक सन्दर्भ में ईसाई धर्म के पक्ष में बेहतर तर्क दे सके ।

1795 में केरी ने एक संस्कृत विद्वान तान्त्रिक साई  हरदाना विद्यावागीश से सम्पर्क किया, जिन्होंने बाद में उन्हें राम मोहन राय से मिलवाया जिन्हें अंग्रेज़ी सीखने की इच्छा थी (राम मोहन राय केवल २४ वर्ष के थे ; इनको राजा की उपाधि १८२८ में मुगल बादशाह ने दी किन्तु मुगल बादशाह को तब अधिकार ही नहीं था किसी को राजा बनाने का । ९ वर्ष की अवस्था में ही राममोहन मदरसे भेजे गये पढ़ने के लिये!)।

1796 और 1797 के बीच केरी, विद्यावागीश और रॉय की तिकड़ी ने "महानिर्वाण तन्त्र" ग्रन्थ की रचना की और इसे "एक सच्चे परमेश्वर" का धर्मग्रन्थ घोषित किया (क्योंकि हिन्दुओं के सारे देवी−देवता ‘झूठे’ थे)। कैरी की भागीदारी उनके विस्तृत रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की गई और वह केवल 1796 में संस्कृत सीखने की रिपोर्ट करते हैं (अर्थात् "महानिर्वाण तन्त्र" ग्रन्थ की रचना एक गुप्त षडयन्त्र थी जिस कारण इसके रचना की रिपोर्टिंग नहीं की गयी) और 1797 में एक व्याकरण पूरा किया, उसी वर्ष उन्होंने बाइबिल के कुछ भाग (जोशुआ से जॉब तक) का अनुवाद किया जो एक बड़ा कार्य था । अगले दो दशकों के लिए "महानिर्वाण तन्त्र" नियमित रूप से संवर्धित किया गया । इसके न्याय−सम्बन्धी अध्यायों का उपयोग बंगाल में ब्रिटिश  न्यायालयों में जमीन्दारी के सम्पत्ति विवादों पर निर्णय के लिए हिन्दू कानून के रूप में किया गया ।

(१७९३ में लार्ड कॉर्नवालिस ने भारत की पञ्चायती व्यवस्था को नष्ट करने के लिये “स्थायी बन्दोबस्त” द्वारा ब्रिटिश−भक्त नये जमीन्दार वर्ग को खड़ा करना आरम्भ किया,उसे स्थापित करने के लिये फर्जी हिन्दू धार्मिक कानून की आवश्यकता थी ताकि पञ्चायतों और पुराने भूस्वामियों की जमीनें हड़पकर नये जमीन्दारों को दी जा सके,वरना एक मोची पादरी और उसके दो हिन्दू नौकरों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी क्यों पूछती!तुर्क−पठान और मुगल कालों में लूट−पाट और हत्यायें हुईं किन्तु पुरातन भारतीय सामाजिक व्यवस्था को जीवन्त रखने वाली पञ्चायती व्यवस्था की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने का कार्य राममोहन राय की ईसाई टीम ने ही किया ।)

किन्तु कुछ ब्रिटिश मजिस्ट्रेटों और कलक्टरों को सन्देह होने लगा और इसके उपयोग (साथ ही हिन्दू कानून के स्रोतों के रूप में पण्डितों पर निर्भरता) को शीघ्र ही घटा दिया गया । (क्योंकि यूरोप में संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन जोड़ पकड़ने लगा था जिस कारण भाण्डा फूट गया कि हिन्दू कानून का आधारग्रन्थ  "महानिर्वाण तन्त्र" नहीं बल्कि “मनुस्मृति” है;तब नया कुतर्क यह दिया गया कि विद्यावागीश जैसे पण्डित बेईमान हैं अतः हिन्दू कानून के बारे में किसी भी पण्डित से राय नहीं लेनी चाहिये!केरी महोदय और राममोहन राय पर कोई आरोप नहीं लगा,केवल एक भाड़े के वाममार्गी तान्त्रिक को बलि का बकरा बनाकर सारे पण्डितों को अविश्वसनीय कहा गया ।) विलियम केरी की टीम से विद्यावागीश कुछ समय के लिए हट गए, लेकिन राम मोहन रॉय से विद्यावागीश ने सम्बन्ध बनाए रखा ।

1797 में राम मोहन कलकत्ता पँहुचे और एक "बनिया" (साहूकार) बन गए, जो अपने साधनों से अधिक खर्च करने वाले कम्पनी के (एय्याश) अंग्रेजों को उधार देते थे (दो वर्ष में ही कितना पैसा कमा लिया,“राजा” की उपाधि भी खरीद ली −− बिना किसी राज पाट के!)। राम मोहन ने अंग्रेजी अदालतों में पण्डित के रूप में अपना कार्य जारी रखा और उससे जीवन यापन करने लगे (सारे हिन्दू विवादों में “महानिर्वाण तन्त्र” को धर्मशास्त्रीय प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत करने की फीस वसूलकर । विभिन्न मुकदमों में उस ग्रन्थ में मनमाना फेरबदल करते रहते थे ताकि पैसे वालों के मन मुताबिक “हिन्दू कानून” दिखाकर पैसा कमा सकें ।)। उन्होंने ग्रीक और लैटिन सीखना आरम्भ किया (क्योंकि पादरियों में उन भाषाओं का अधिक महत्व था)। ⋅⋅⋅ ⋅⋅⋅

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2591945744150047&id=100000039405456

Tuesday, July 23, 2019

ईश्वर और अल्लाह एक नहीं हैं

#ईश्वर_और_अल्लाह_एक_नहीं_हैं

१) - ईश्वर सर्वव्यापक (omnipresent) है, जबकि अल्लाह सातवें आसमान पर रहता है।

२) - ईश्वर सर्वशक्तिमान (omnipotent) है, वह कार्य करने में किसी की सहायता नहीं लेता, जबकि अल्लाह को फरिश्तों और जिन्नों की सहायता लेनी पडती है।

३) - ईश्वर न्यायकारी है, वह जीवों के कर्मानुसार नित्य न्याय करता है, जबकि अल्लाह केवल क़यामत के दिन ही न्याय करता है, और वह भी उनका जो की कब्रों में दफनाये गए हैं।

४) - ईश्वर क्षमाशील नहीं, वह दुष्टों को दण्ड अवश्य देता है, जबकि अल्लाह दुष्टों, बलात्कारियों के पाप क्षमा कर देता है। मुसलमान बनने वाले के पाप माफ़ कर देता है।

५) - ईश्वर कहता है, "मनुष्य बनों" मनु॑र्भव ज॒नया॒ दैव्यं॒ जन॑म् - ऋग्वेद 10.53.6,
जबकि अल्लाह कहता है, मुसलमान बनों सूरा-2, अलबकरा पारा-1, आयत-134,135,136

६)- ईश्वर सर्वज्ञ है, जीवों के कर्मों की अपेक्षा से तीनों कालों की बातों को जानता है,जबकि अल्लाह अल्पज्ञ है, उसे पता ही नहीं था की शैतान उसकी आज्ञा पालन नहीं करेगा, अन्यथा शैतान को पैदा क्यों करता.......?

७) - ईश्वर निराकार होने से शरीर-रहित है, जबकि अल्लाह शरीर वाला है,एक आँख से देखता है।

मैंने (ईश्वर) ने इस कल्याणकारी वेदवाणी को सब लोगों के कल्याण केसलिए दिया हैं-
यजुर्वेद 26/

''अल्लाह 'काफिर' लोगों (गैर-मुस्लिमो ) को मार्ग नहीं दिखाता'' (१०.९.३७ पृ. ३७४) (कुरान 9:37)

८) - ईशवर कहता है सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवां भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते।-(ऋ० १०/१९१/२)

#अर्थ:-हे मनुष्यो ! मिलकर चलो,परस्पर मिलकर बात करो। तुम्हारे चित्त एक-समान होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार पूर्व विद्वान,ज्ञानीजन सेवनीय प्रभु को जानते हुए उपासना करते आये हैं,वैसे ही तुम भी किया करो।
क़ुरान का अल्लाह कहता है  ''हे 'ईमान' लाने वालों! (मुसलमानों) उन 'काफिरों' (गैर-मुस्लिमो) से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं, और चाहिए कि वे तुममें सखती पायें।'' जो इंसान मुझपर इमान नहीं लाता। वो काफिर है और उसे जीने का कोई हक नहीं है। (११.९.१२३ पृ. ३९१) (कुरान 9:123) ।

९) - अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभाय ।-(ऋग्वेद ५/६०/५)

अर्थ:-ईश्वर कहता है कि हे संसार के लोगों ! न तो तुममें कोई बड़ा है और न छोटा।तुम सब भाई-भाई हो। सौभाग्य की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ो।इस धरा पर जितने भी जीव हैं, सबमें मेरा अंश है और सभी जीवों को एक समान जीने का अधिकार है। सबको जीने का हक है

''हे 'ईमान' लाने वालो (केवल एक अल्लाह को मानने वालो ) 'मुश्रिक' (मूर्तिपूजक) नापाक (अपवित्र) हैं।'' दुनिया में इस्लाम को मानने वाले ही पाक हैं। (१०.९.२८ पृ. ३७१) (कुरान 9:28)

१०) - क़ुरान का अल्लाह अज्ञानी है वे मुसलमानों का इम्तिहान लेता है तभी तो इब्रहीम से पुत्र की क़ुर्बानी माँगीं।

वेद का ईशवर सर्वज्ञ अर्थात मन की बात को भी जानता है उसे इम्तिहान लेने की अवशयकता नही।

११) - अल्ला जीवों के और  काफ़िरों के प्राण लेकर खुश होता है

लेकिन वेद का ईशवर मानव व जीवों पर सेवा भलाई दया करने पर खुश होता है। 

ऐसे तो अनेक प्रमाण हैं, किन्तु इतने से ही बुद्धिमान लोग समझ जायेंगे की ईश्वर और अल्लाह एक नहीं हैं।

मेरे इन उदाहरणों से अब तो आप लोग बखूबी समझ गए होंगे कि ईश्वर और अल्लाह को एक नहीं माना जा सकता।

दो समय की रोटी को तरसती एक डकैत की माँ


(चंद्रशेखर आजाद के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति)
*प्रस्तुति -  ‘अवत्सार’*

राइटर व हिस्टोरियन जानकी शरण वर्मा बताते हैं -
चंद्रशेखर आजाद ने अपनी फरारी के करीब 5 साल बुंदेलखंड में गुजारे थे। इस दौरान वे ओरछा और झांसी में भी रहे। ओरछा में सातार नदी के किनारे गुफा के समीप कुटिया बना कर वे डेढ़ साल रहे। फरारी के समय सदाशिव उन विश्वसनीय लोगों में से थे, जिन्हें आजाद अपने साथ मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा गांव ले गए थे। यहां उन्होंने अपने पिता सीताराम तिवारी और मां जगरानी देवी से उनकी मुलाकात करवाई थी।

सदाशिव, आजाद की मृत्यु के बाद भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते रहे। कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा। आजादी के बाद जब वह स्वतंत्र हुए, तो वह आजाद के माता-पिता का हालचाल पूछने उनके गांव पहुंचे। वहां उन्हें पता चला कि चंद्रशेखर आजाद की शहादत के कुछ साल बाद उनके पिता की भी मृत्यु हो गई थी। आजाद के भाई की मृत्यु भी उनसे पहले ही हो चुकी थी।

*पिता के निधन के बाद आजाद की मां बेहद गरीबी में जीवन जी रहीं थी। उन्होंने किसी के आगे हाथ फैलाने की जगह जंगल से लकड़ियां काटकर अपना पेट पालना शुरू कर दिया था। वह कभी ज्वार, तो कभी बाजरा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं। क्योंकि दाल, चावल, गेंहू और उसे पकाने के लिए ईंधन खरीदने लायक उनमें शारीरिक सामर्थ्य बचा नहीं था।*

*सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि उनकी यह स्थिति देश को आजादी मिलने के दो वर्ष बाद (1949) तक जारी रही। सदाशिव ने जब यह देखा, तो उनका मन काफी व्यथित हो गया। आजाद की मां दो वक्त की रोटी के लिए तरस रही है, यह कारण जब उन्होंने गांव वालों से जानना चाहा तो पता चला कि उन्हें डकैत की मां कहकर बुलाया जाता है। साथ ही उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था।*

आजाद की मां की ऐसी दुर्दशा सदाशिव से नहीं देखी गई। वह उन्हें अपने वचन का वास्ता देकर अपने साथ झांसी लेकर आ गये ।  मार्च 1951 में आजाद की माँ का झांसी में निधन हो गया । सदाशिव ने उनका सम्मान अपनी माँ की तरह करते हुए उनका अंतिम संस्कार खुद अपने हाथों से बड़ागांव गेट के पास के शमशान में किया । यहां आजाद की माँ की स्मारक बनी है । लेकिन दुर्भाग्य से आजाद जैसे  आजादी के मतवाले को जन्म देने वाली इस राष्ट्रमाता का स्मारक झांसी में आकार नहीं ले पाया है ।                                                   साभार- दैनिक भास्कर                          💐💐💐🌹🌹🌹

Monday, July 22, 2019

17 OBC caste अब SC में शामिल ।


ये है वह संविधान इसमें कोई ऊपर नहीं जा सकता ।
एक महाराज मनु का संविधान है जिसमें - वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ।

संविधान से शुद्र शुद्र ही रहेगा युगों युगों तक , लेकिन मनु महाराज के संविधान से शुद्र भी ब्राह्मण बन जाते हैं । 21 शुद्र ऋषियों के उल्लेख मिलते हैं वेदों में और जिनके मन्त्रों और श्लोकों को वेदों और शास्त्रों में स्थान दिया गया ।
इन ऋषियों को शुद्र नहीं बोला गया है , बल्कि ऋषि , मुनि और ब्राह्मण शब्द से संबोधित किया गया है ।
इनके श्लोकों को उन्हीं ब्राह्मणों ने शास्त्रों में स्थान दिया जिन पर आरोप लगाया जाता है कि ब्राह्मणों ने शूद्रों को पढ़ने नहीं दिया और मन्त्र सुनते ही कान में शीशा पिघला कर डालकर मार डालते थे।

सूत जी पूरी भागवत सुना देते हैं , तब उनके कानों में शीशा पिघला कर नहीं डाला गया । सूत जी ने अपने 6 ब्राह्मण शिष्य बनाये , तब उनके कान में शीशा पिघला कर नहीं डाला गया और न ही उन्हें किसी ने कुँए से पानी लेने को मना किया ।

नैमिषारण्य में हज़ारों ऋषियों ने यज्ञ प्रारम्भ किया तो जो समय बच जाता था वह सूत जी से कथा सुनकर और उनको ऊँचे आसान पर  व्यासपीठ पर बिठाकर , स्वयं सारे ब्राह्मण नीचे बैठकर उनका सम्मान करते थे , तब किसी ने भी सूत जी के कानों में शीशा नहीं पिघलाया और न ही कूवें से पानी लेने को मना किया ।
फिर उन्हीं सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा को भी सभी ब्राह्मणों और ऋषियों ने व्यासपीठ पर बिठाया लेकिन अब भी उनके कानों में कोई शीशा नहीं पिघला रहा है ।

पहले वेदों के मंत्रों या श्लोकों का उच्चारण इतनी ज़ोर ज़ोर से और सभी ब्राह्मण इतने उच्च स्वर से करते थे कि आकाश गुंजायमान हो जाता था ।
इसका क्या कारण था ??

ये भगवान को नहीं सुनाते थे ! भगवान तो मन में भी चल रहा होगा , वह भी सुन लेते हैं ।

इसका एकमात्र कारण यही था कि सभी लोग इन वेद मंत्रों को सुनकर उनके सिद्धांत , शिक्षाओं को सुनकर ( मैं कौन , मेरा लक्ष्य क्या है , मुझे क्या पाना है , किसको पाना है , वह कैसे मिलेगा , हमें क्या करना चाहिए ) इत्यादि जानकर मनुष्य कल्याण मार्ग पर चल पड़े और अपना कल्याण करे ।
चूंकि उस समय की भाषा वैदिक संस्कृत ही थी , और सभी संस्कृत समझते थे तो यह सबके लिए ग्राह्य था ।

उस उच्चारण में वह यह नहीं देखते थे कि इसको कोई शुद्र या किसी अन्य जाति सुन लेगा ! अरे इसका उद्देश्य ही यही होता था ।

वहाँ कोई शीशा पिघलाकर कान में डालने नहीं जाता था जैसा वामी इतिहासकारों ने ज़हर घोला है ।

जाबाल नामक नीच कुल की कन्या का पुत्र सत्यकाम का उपनयन संस्कार गौतम ऋषि ने किया और उन्हें वेद इत्यादि की शिक्षा देकर ऋषि बना दिया । उन्हीं नीच कुल के ऋषि से शिक्षा ग्रहण कर और उनका शिष्यत्व ग्रहण कर अनेक ब्राह्मण ऋषियों ने अपना कल्याण किया ।

लेकिन किसी भी ब्राह्मण ऋषि ने सत्यकाम के कानों में शीशा पिघला कर नहीं डाला ।

ऐतरेय ऋषि जिन्होंने ऐतरेय उपनिषद की रचना की , वह शुद्र थे । लेकिन उनके पुस्तक को न किसी ने जलाया और न ही उनके कानों में शीशा पिघला कर डाला गया ।

ऐलूष ऋषि , पृषध , धृष्ट , गृत्स्मद, गृत्समती , वीतहव्य, इत्यादि किसी के कानों में शीशा पिघला कर नहीं डाला गया बल्कि आज इनके लिखे हुए वचन शास्त्र कहलाते हैं।

मातंग ऋषि चाण्डालपुत्र थे , लेकिन इनका शिष्यत्व अनेक ब्राह्मणों ने किया और इनको व्यासपीठ पर सुशोभित किया । न ही इनको किसी ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए हत्या की और न ही इनके कानों में पिघला शीशा डाला गया ।

ये वामी इतिहासकार और अंग्रेज हमें बहकाते गए और हम अपने ही शास्त्रों को बिना पढ़े जलाते गए और सेक्युलर के कीड़े से कटवाकर अपना पूर्ण विनाश कर लिया ।

ब्राह्मणों के प्रति इतना विद्वेष इतना ज़हर फैलाया गया कि वह आज लोगों के रग रग में व्याप्त हो गया है।

ब्राह्मण आज हर समाज का punching bag है जो सबकी गालियों और सबके थपेड़े सह रहा है । यह वह जीवित प्राणी है जिस पर हर युग में अत्याचार हुआ है । जितनी भी कथाएँ आप पढेंगे , उसमें जितने भी राक्षस , या बाहर से विदेशी आते हैं सबसे पहले वह ब्राह्मणों का विनाश करते हैं , उनकी हत्यायें करते हैं , क्योंकि ये जानते हैं बस इनका विनाश कर दो तो पूरी संस्कृति और सभ्यता का विनाश स्वयमेव हो जाएगा उनको ज्यादा मेहनत की ज़रूरत नहीं पड़ेगी ।

यही काम मैक्समूलर, ग्रिफ्फिथ, ब्लूमफील्ड , मैकाले इत्यादि ने किया ।

अगर आप समझे तब ठीक है , नहीं मानना तब आप अपना विनाश स्वयं आमंत्रित कर रहे हैं ।

धन्यवाद